स्केलिंग — बड़ा करना
तीन डिस्ट्रिक्ट्स डन, पूरा India बाक़ी
PahadiDirect लॉन्च हुए 14 महीने हो गए। ऐप तीन डिस्ट्रिक्ट्स में अच्छा चल रहा है — नैनीताल, अल्मोड़ा, चम्पावत। 800 फ़ार्मर्स हैं, 3,500 एक्टिव बायर्स, मंथली GMV ₹38 लाख। टीम 2 से बढ़कर 8 हो गई। दफ़्तर है — हल्द्वानी में एक मिठाई की दुकान के ऊपर छोटा कमरा, स्पॉटी WiFi, लेकिन पहाड़ों का शानदार व्यू।
अब प्रिया दीवार पर लगे मैप को देख रही है। Uttarakhand में 13 डिस्ट्रिक्ट्स हैं। वो 3 में है। पड़ोस में Himachal Pradesh — सेम टरेन, सेम क्रॉप्स, सेम फ़ार्मर समस्याएँ। पूरे उत्तर भारत में हिल फ़ार्मर्स को मिडलमैन स्क्वीज़ फ़ेस करना पड़ता है।
निवेशक कॉल्स पॉइंटेड हो रहे हैं। "नए डिस्ट्रिक्ट्स कब?" "Himachal का प्लान?" "हिल रीजन्स के बाहर काम करेगा?"
प्रिया जानती है क्वेश्चन्स वैलिड हैं। लेकिन एक बात समझाना मुश्किल है कॉल पर: जो अल्मोड़ा में काम करता है वो अपने-आप पिथौरागढ़ में नहीं करेगा। क्रॉप्स अलग हैं। रास्ते और बुरे हैं। फ़ार्मर्स कुमाऊँनी बोलते हैं यहाँ, गढ़वाली वहाँ। लॉजिस्टिक्स साझेदार उस रूट कवर नहीं करता।
स्केलिंग कॉपी-पेस्ट नहीं है। हर बार नए कॉन्टेक्स्ट में रीबिल्ड करना है।
स्केल कब करें vs ऑप्टिमाइज़ कब करें
इस चैप्टर का सबसे ज़रूरी सवाल। ग़लत आंसर दिया तो या तो विंडो मिस करोगे या पैसे जला दोगे।
ऑप्टिमाइज़ करो जब:
- यूनिट इकोनॉमिक्स काम नहीं कर रहे (हर ट्रांज़ैक्शन पर घाटा)
- ग्राहकों चर्न कर रहे हैं — एक बार ट्राई करते हैं, वापस नहीं आते
- संचालन मैन्युअल एफ़र्ट और जुगाड़ पर टिकी हैं
- टीम ओवरव्हेल्म्ड है करंट वॉल्यूम से
- गुणवत्ता, डिलीवरी, रिलायबिलिटी की कम्प्लेंट्स आ रही हैं
स्केल करो जब:
- यूनिट इकोनॉमिक्स पॉज़िटिव हैं (हर ट्रांज़ैक्शन पर मुनाफ़ा, भले ही छोटा)
- ग्राहकों टिक रहे हैं (स्ट्रॉन्ग रिटेंशन, रिपीट रेट्स)
- संचालन ज़्यादा वॉल्यूम सँभाल सकती हैं प्रपोर्शनल लागत इनक्रीज़ बिना
- प्लेबुक आइडेंटिफ़ाई हो गया — ग्राहकों एक्वायर करना, आपूर्ति ऑनबोर्ड करना, डिलीवर करना — सब पता है
- मार्केट पुल हो रहा है — नई जियोग्राफ़ीज़ से माँग आ रही है
प्रिया का नियम ऑफ़ थम्ब: "अगर 100 और फ़ार्मर्स ऐड करने से सिस्टम टूट जाए, तो रेडी नहीं हैं। अगर 100 और फ़ार्मर्स ऐड करना बस सेम प्लेबुक नए पिन कोड में चलाना है — रेडी हैं।"
स्टार्टअप्स की सबसे महँगी ग़लती: जो काम नहीं करता उसे स्केल करना। लीकी बकेट में और पानी डालने से बकेट ठीक नहीं होता। पहले लीक्स फ़िक्स करो।
उत्पाद स्केल करना
शुरू में उत्पाद के पीछे बहुत मैन्युअल काम होता है। 300 फ़ार्मर्स के लिए ठीक है। 3,000 के लिए नहीं।
मैन्युअल से ऑटोमेटेड
100 फ़ार्मर्स पर प्रिया की टीम मैन्युअली फ़ार्मर्स-बायर्स मैच करती थी। कॉल करके भंडार चेक, ऐप अपडेट बाय हैंड।
800 फ़ार्मर्स पर नामुमकिन। ज़रूरत:
- ऑटोमेटेड भंडार अपडेट्स — फ़ार्मर्स ख़ुद ऐप से प्रोड्यूस एंटर करें
- मैचिंग एल्गोरिदम्स — प्लेटफ़ॉर्म अपने-आप आपूर्ति-माँग कनेक्ट करे
- ऑटोमेटेड नोटिफ़िकेशन्स — बायर्स को अलर्ट मिले प्रेफ़र्ड प्रोड्यूस अवेलेबल होने पर
- पेमेंट इंटीग्रेशन — मैन्युअल बैंक ट्रांसफ़र्स बंद
हर ऑटोमेशन लेयर ने टीम को फ़्री किया — संचालन से बढ़त पर ध्यान शिफ़्ट हुआ।
ऐप से प्लेटफ़ॉर्म
सिंगल-पर्पज़ ऐप एक काम अच्छा करता है। प्लेटफ़ॉर्म इकोसिस्टम बनाता है।
प्रिया का इवोल्यूशन:
- चरण 1: बाइंग-सेलिंग ऐप (मार्केटप्लेस)
- चरण 2: लॉजिस्टिक्स ट्रैकिंग ऐड
- चरण 3: इनपुट आपूर्ति ऐड (फ़ार्मर्स सीड्स, फ़र्टिलाइज़र्स ऐप से ख़रीदें)
- चरण 4: क्रेडिट ऐड (ट्रांज़ैक्शन हिस्ट्री पर स्मॉल लोन्स)
- चरण 5: एडवाइज़री ऐड (वेदर अलर्ट्स, क्रॉप रेकमेंडेशन्स, मूल्य निर्धारण इनसाइट्स)
हर लेयर प्लेटफ़ॉर्म स्टिकियर बनाती है — फ़ार्मर्स और बायर्स दोनों के लिए ज़्यादा वजहें रुकने के।
टीम स्केल करना
3 लोगों से 30 पर जाना फ़ाउंडर्स के सबसे मुश्किल ट्रांज़िशन्स में से है।
तेज़ हायर करना, कल्चर बनाए रखना
3 लोगों पर कल्चर अपने-आप है। 30 पर इंटेंशनल बनाना पड़ता है।
आम हायरिंग ग़लतियाँ:
- सिर्फ़ हुनर देखना, फ़िट इग्नोर करना। ब्रिलियंट डेवलपर जो मिशन में बिलीव नहीं करता — टीम पॉइज़न करेगा।
- बहुत सीनियर हायर, बहुत जल्दी। VP ऑफ़ मार्केटिंग जो ₹500 करोड़ बजट सँभालता था — ₹5 लाख बजट से क्या करेगा?
- बहुत जूनियर हायर, पैसे बचाने के लिए। इंटर्न्स क्रिटिकल सिस्टम्स नहीं बना सकते।
- फ़्रेंड्स हायर करना। अच्छे भी हो सकते हैं, लेकिन फ़ायर कर सकोगे अगर परफ़ॉर्म न करें? नो, तो हायर मत करो।
- पैनिक में हायर करना। "ओवरव्हेल्म्ड हैं, किसी को भी हायर करो!" = बैड फ़ैसले।
ऑर्ग स्ट्रक्चर शिफ़्ट
- 3-8 लोग: सब फ़ाउंडर को रिपोर्ट करते हैं। हायरार्की नहीं चाहिए।
- 8-20 लोग: टीम लीड्स चाहिए। इंजीनियरिंग, संचालन, बढ़त — हरेक को कोई ओन करे।
- 20-50 लोग: प्रबंधक्स, प्रक्रियाेस, डॉक्यूमेंटेशन, HR फ़ंक्शन चाहिए।
प्रिया का सबसे मुश्किल मोमेंट: जब रियलाइज़ किया कि हर मीटिंग में नहीं बैठ सकती। लोगों पर ट्रस्ट करना पड़ेगा फ़ैसले लेने के लिए। "डेलिगेशन कंट्रोल छोड़ना नहीं है," मेंटर ने बोला। "ये मशीन बिल्ड करना है जो बिना तुम्हारे चले।"
संचालन स्केल करना
प्रक्रियाेस और SOPs
छोटे होते हो तो सब मेमोरी और इंस्टिंक्ट से चलता है। स्केल करो तो SOPs चाहिए:
- नया फ़ार्मर कैसे ऑनबोर्ड करें? (चरण-बाय-चरण, चेकलिस्ट)
- कम्प्लेंट कैसे सँभालें? (रिस्पॉन्स टाइम, एस्केलेशन पाथ)
- गुणवत्ता कंट्रोल कैसे करें? (सैंपलिंग प्रक्रिया, रिजेक्शन क्राइटेरिया)
- नया फ़ील्ड एजेंट कैसे ट्रेन करें? (ऑनबोर्डिंग मॉड्यूल, शैडोइंग पीरियड)
टेस्ट: नया हायर प्रक्रिया पालन कर सकता है फ़ाउंडर से बिना पूछे? नहीं, तो प्रक्रिया ठीक से डॉक्यूमेंटेड नहीं है।
डेलिगेशन
फ़ाउंडर्स जो डेलिगेट नहीं कर सकते, स्केल नहीं कर सकते। पीरियड।
प्रोग्रेशन:
- तुम सब करो (0-6 मंथ्स)
- तुम करो, कोई देखे (टीचिंग)
- वो करे, तुम देखो (सुपरविज़न)
- वो करे, तुम्हें रिपोर्ट करे (डेलिगेशन)
- वो करे और दूसरों को ट्रेन करे (मल्टीप्लिकेशन)
ज़्यादातर फ़ाउंडर्स चरण 2-3 के बीच फँसते हैं। छोड़ नहीं पाते। "कोई मेरे जितना अच्छा नहीं कर सकता" — ये थॉट स्केलिंग किल करता है।
प्रिया का संचालन प्रबंधक दीपक हल्द्वानी का लोकल लड़का था जिसने 10 साल ट्रांसपोर्ट बिज़नेस चलाया था। "एग्री-टेक" नहीं जानता था। लेकिन लॉजिस्टिक्स जानता था, रास्ते जानता था, ड्राइवर्स सँभालना जानता था। तीन महीने में तीन डिस्ट्रिक्ट्स की डिलीवरी रूट्स सिस्टमाइज़ कर दीं।
जियोग्राफ़िक स्केलिंग
नए मार्केट्स, नई समस्याएँ
प्रिया ने नैनीताल से चम्पावत एक्सपैंड करते हुए सीखा:
- क्रॉप्स अलग। नैनीताल एपल-हेवी। चम्पावत ऑफ़-सीज़न वेजिटेबल्स और मंडुआ।
- इन्फ़्रास्ट्रक्चर अलग। चम्पावत में रोड्स बहुत वर्स। डिलीवरी टाइम डबल।
- ट्रस्ट लेवल्स अलग। नैनीताल में वर्ड-ऑफ़-माउथ से अर्ली एडॉप्टर्स मिले। चम्पावत में अजनबी थी ऐप लेकर।
- कॉम्पिटीशन अलग। हर डिस्ट्रिक्ट में मिडलमैन नेटवर्क्स अलग और एन्ट्रेन्च्ड।
एक्सपैंशन प्लेबुक
- स्काउट — डिस्ट्रिक्ट विज़िट, 50 फ़ार्मर्स से बात, लोकल डायनामिक्स समझो
- पायलट — 20-30 फ़ार्मर्स ऑनबोर्ड, 2 मंथ्स चलाओ, देखो क्या टूटा
- फ़िक्स — लोकल समस्याएँ एड्रेस करो
- रैंप — पायलट काम करे तो फ़ील्ड एजेंट्स लाओ, 100+ फ़ार्मर्स तक स्केल
- स्टेबिलाइज़ — 2 मंथ्स और चलाओ, डिस्ट्रिक्ट सेल्फ़-सस्टेनिंग बनाओ
- मूव ऑन — अगला डिस्ट्रिक्ट स्काउट करो
हर डिस्ट्रिक्ट 4 महीने लेता है। 13 डिस्ट्रिक्ट्स सिर्फ़ Uttarakhand, प्लस Himachal। मल्टी-ईयर जर्नी।
लोकलाइज़ेशन मायने्स
"लोकलाइज़ेशन" सिर्फ़ ऐप ट्रांसलेट करना नहीं:
- लैंग्वेज — कुमाऊँ में कुमाऊँनी, गढ़वाल में गढ़वाली, प्लेन्स में हिंदी
- क्रॉप कैलेंडर्स — हार्वेस्ट कब, ऑल्टीट्यूड और डिस्ट्रिक्ट से वेरी
- पेमेंट प्रेफ़रेंसेस — टाउन्स में UPI, रिमोट इलाक़ाज़ में कुछ फ़ार्मर्स कैश प्रेफ़र करते हैं
- कम्यूनिकेशन — WhatsApp ग्रुप्स पुश नोटिफ़िकेशन्स से बेटर काम करते हैं
- कल्चरल कॉन्टेक्स्ट — रिमोट विलेज में फ़ार्मर तरीक़ा करना हाईवे टाउन से अलग
यूनिट इकोनॉमिक्स स्केल से पहले काम करने चाहिए
अपना सेक्शन डिज़र्व करता है — यहीं ज़्यादातर स्टार्टअप्स मरती हैं।
प्रिया के लिए:
- एवरेज ऑर्डर वैल्यू: ₹2,400
- कमीशन (12%): ₹288
- प्रक्रियािंग + लॉजिस्टिक्स लागत पर ऑर्डर: ₹180
- कॉन्ट्रीब्यूशन मार्जिन: ₹108 (पॉज़िटिव)
पॉज़िटिव है — हर ऑर्डर पैसे बनाता है। स्केलिंग = ज़्यादा ऑर्डर्स, ज़्यादा मुनाफ़ा।
लेकिन अगर नंबर्स ये होते:
- कमीशन: ₹288
- लागत: ₹350
- कॉन्ट्रीब्यूशन मार्जिन: -₹62 (नेगेटिव)
हर ऑर्डर घाटा — स्केलिंग = ज़्यादा ऑर्डर्स, ज़्यादा घाटा। क्लिफ़ की तरफ़ तेज़ भाग रहे हो।
फ़ायदेमंद चीज़ स्केल करो। ब्रोकन फ़िक्स करो।
रावत जी इंट्यूटिवली समझते हैं। एपल जूस एक्सपेरिमेंट में हर बॉटल ₹85 लागत, बिक ₹70 में — उन्होंने नहीं बोला "10,000 बॉटल्स बनाऊँ, लागत कम हो जाएगी।" बोला "पहले ₹55 में बनाना सीखूँ।"
टेक्नोलॉजी स्केलिंग
- 100 इस्तेमालर्स: बुनियादी क्लाउड सर्वर ₹2,000/मंथ
- 10,000 इस्तेमालर्स: लोड मिलान, डेटाबेस ऑप्टिमाइज़ेशन — ₹30,000/मंथ
- 1,00,000 इस्तेमालर्स: सही DevOps टीम — ₹2-5 लाख/मंथ
नियम: इन्फ़्रास्ट्रक्चर में थोड़ा एक्स्ट्रा निवेश करो। एपल हार्वेस्ट सीज़न में 500 फ़ार्मर्स प्रोड्यूस लिस्ट करें और ऐप क्रैश हो — ट्रस्ट रीबिल्ड करने में महीने लगते हैं।
टेक्निकल डेट
"टेक्निकल डेट" — कोड में शॉर्टकट्स। फ़ास्ट बिल्ड करते हो तो शॉर्टकट्स लेते हो। छोटे स्केल पर ठीक। बड़े स्केल पर फ़ाउंडेशन में क्रैक्स बन जाती हैं।
प्रिया की टीम ने पूरा एक महीना सिर्फ़ कोड क्लीन-अप और कोर मॉड्यूल्स रीराइट करने में लगाया। नो न्यू फ़ीचर्स, नो बढ़त। निवेशक को पसंद नहीं आया। लेकिन ज़रूरी था।
आम स्केलिंग ग़लतियाँ
1. उत्पाद-मार्केट फ़िट से पहले स्केल करना
सबसे डेडली ग़लती। बढ़त में पैसे डाल रहे हो लेकिन ग्राहकों टिक नहीं रहे।
2. बहुत तेज़ हायर करना
2 मंथ्स में 20 लोग — कैओस। न्यू हायर्स को कल्चर नहीं पता, प्रक्रियाेस रेडी नहीं।
बेटर: 3-5 लोग एक बार में। ठीक से ऑनबोर्ड करो। फिर नेक्स्ट बैच।
3. बहुत सारे मार्केट्स एक साथ
"5 डिस्ट्रिक्ट्स साइमल्टेनियसली लॉन्च!" = सब कुछ 20% गुणवत्ता पर।
बेटर: एक मार्केट, नेल करो, नेक्स्ट पर जाओ।
4. कोर उत्पाद से ध्यान हटना
स्केलिंग में फ़ाउंडर्स संचालन, हायरिंग, फ़ंडरेज़िंग, मीटिंग्स में खिंच जाते हैं। उत्पाद स्टैगनेट हो जाता है।
5. कल्चर इग्नोर करना
5 लोगों पर कल्चर वाइब है। 50 पर सिस्टम है। एक्टिवली शेप नहीं करोगे तो ख़ुद शेप होगा — और इस्तेमालुअली सही डायरेक्शन में नहीं।
6. मिड-स्केल पैसे ख़त्म हो जाना
एग्रेसिवली स्केल शुरू किया और हाफ़वे पैसे ख़त्म — बहुत बड़े स्क्रैपी होने के लिए, बहुत छोटे टिकाऊ होने के लिए।
बेटर: रनवे जानो। मीन्स के अंदर स्केल करो। नेक्स्ट राउंड पहले रेज़ करो।
प्रिया का स्केलिंग प्लान
निवेशक, टीम, और पुष्पा दीदी (जो बोलती रहीं "चलने से पहले दौड़ मत") से बात करके प्रिया ने 24-मंथ प्लान बनाया:
मंथ्स 1-6: 3 से 6 डिस्ट्रिक्ट्स, Uttarakhand। 4 फ़ील्ड एजेंट्स हायर। ऐप वर्शन 2 — ऑटोमेटेड मैचिंग, पेमेंट इंटीग्रेशन।
मंथ्स 7-12: 13 डिस्ट्रिक्ट्स Uttarakhand। Himachal में 2 डिस्ट्रिक्ट्स पायलट। हेड ऑफ़ संचालन और हेड ऑफ़ उत्पाद हायर।
मंथ्स 13-18: Himachal 5 डिस्ट्रिक्ट्स। J&K और Northeast एक्सप्लोर। सीरीज़ A रेज़।
मंथ्स 19-24: सीरीज़ A सफल तो प्लेटफ़ॉर्म प्ले — इनपुट आपूर्ति, क्रेडिट, एडवाइज़री।
एम्बिशस लेकिन ग्राउंडेड। हर एक्सपैंशन प्रीवियस चरण काम करने पर कंटिंजेंट। कोई ब्लाइंड लीप्स नहीं।
की टेकअवेज़
- स्केल तभी करो जब यूनिट इकोनॉमिक्स काम करें और ग्राहकों टिकें।
- स्केल से पहले ऑटोमेट करो। 100 इस्तेमालर्स पर चलने वाले मैन्युअल प्रक्रियाेस 1,000 पर कोलैप्स होंगे।
- केयरफ़ुली हायर करो। फ़ास्ट हायरिंग विदाउट कल्चर = कैओस।
- सब डॉक्यूमेंट करो। SOPs बोरिंग हैं लेकिन ज़रूरी।
- एक मार्केट एक बार एक्सपैंड करो। नेल करो, सीखो, एडाप्ट करो, फिर नेक्स्ट।
- लोकलाइज़ करो, कॉपी-पेस्ट मत करो।
- टेक्निकल डेट प्लान करो। बढ़त स्प्रिंट्स के बीच फ़ाउंडेशन फ़िक्स करने का टाइम रखो।
- रनवे ध्यान में रखो। मिड-स्केल पैसे ख़त्म मत होने दो।
- फ़ाउंडर का सबसे मुश्किल ट्रांज़िशन: करने से डेलिगेट करने तक।
प्रिया स्केल कर रही है। लेकिन सीख रही है कि अकेली नहीं है — सपोर्ट का इकोसिस्टम है: इनक्यूबेटर्स, एक्सीलरेटर्स, मेंटर्स, गवर्नमेंट प्रोग्राम्स। India का स्टार्टअप इकोसिस्टम बहुत बड़ा है, छोटे शहरों के फ़ाउंडर्स भी टैप कर सकते हैं। अगले चैप्टर में एक्सप्लोर करते हैं।