कैश फ़्लो सँभालना

वो महीना जब पैसा नहीं आया

बुधवार की दोपहर है, हल्द्वानी। भंडारी अंकल दुकान के काउंटर के पीछे बैठे फ़ोन देख रहे हैं। तीसरी बार बैंक बैलेंस चेक किया आज। नंबर वही है: ₹47,000.

शुक्रवार को सीमेंट डिस्ट्रीब्यूटर को ₹1,80,000 देने हैं। नॉन-नेगोशिएबल — मिस करो तो आपूर्ति बंद। बिना सीमेंट के कॉन्ट्रैक्टर्स को क्या बेचोगे?

भंडारी अंकल अपनी क्रेडिट रजिस्टर खोलते हैं — वो मोटी, पुरानी नोटबुक जिसमें हर कॉन्ट्रैक्टर का बाक़ी हिसाब लिखा है। पलटते हैं:

रमेश: ₹1,35,000 (45 दिन पुराना) तिवारी बिल्डर: ₹1,20,000 (28 दिन) सोनू कॉन्ट्रैक्टर: ₹78,000 (60 दिन) तीन छोटे अकाउंट्स: ₹67,000 मिलाकर

कुल बाक़ी: ₹4,00,000। चार लाख रुपये, उन लोगों के पास जिनको रोज़ सामान बेचते हैं।

काग़ज़ पर भंडारी अंकल की दुकान ने पिछली क्वार्टर में ₹1.8 लाख मुनाफ़ा किया। फ़ायदेमंद है। हेल्दी है। बढ़ भी रही है। लेकिन अभी, इसी मोमेंट, ₹1,80,000 पे करने का कैश नहीं है। और डेडलाइन दो दिन बाद है।

रमेश को कॉल करते हैं। "भाई, वो पेमेंट..."

"भंडारी जी, बिल्डर ने अभी रिलीज़ नहीं किया। अगले हफ़्ते पक्का।"

अगले हफ़्ते। हमेशा अगले हफ़्ते।

ये चैप्टर उस एक चीज़ के बारे में है जो ख़राब उत्पाद, ख़राब मार्केटिंग, या बैड लक से ज़्यादा स्मॉल बिज़नेसेज़ बंद करती है: कैश ख़त्म हो जाना।

मुनाफ़ा ख़त्म होना नहीं। कैश ख़त्म होना। दोनों एक चीज़ नहीं हैं। और ये फ़र्क़ समझना इस पूरी किताब का सबसे ज़रूरी फ़ाइनेंशियल लेसन है।

पार्ट 2 में आपका स्वागत है। बिज़नेस चल रहा है। अब उसे ज़िंदा रखना है।

कैश फ़्लो vs मुनाफ़ा — वो फ़र्क़ जो बिज़नेस बचाता है

सबसे ख़तरनाक कन्फ़्इस्तेमालन से शुरू करते हैं।

मुनाफ़ा वो है जो बुक्स बताती हैं कि कमाया। राजस्व माइनस ख़र्चे, किसी पीरियड में। ये अकाउंटिंग कॉन्सेप्ट है।

कैश फ़्लो वो है जो असलीी बैंक अकाउंट और कैश ड्रॉअर में आ-जा रहा है। जिसे छू सकते हो, ख़र्च कर सकते हो, बिल्स पे कर सकते हो।

दोनों एक नहीं हैं। दोनों बिल्कुल उल्टी डायरेक्शन में भी जा सकते हैं।

भंडारी अंकल का P&L कहता है — पिछली क्वार्टर में ₹1.8 लाख मुनाफ़ा हुआ। ये सही है — बेचा ज़्यादा, ख़र्चा कम। लेकिन ₹4 लाख राजस्व कॉन्ट्रैक्टर्स को दिए क्रेडिट में फँसा है। सामान दुकान से गया। बिल बना। मुनाफ़ा रिकॉर्ड हुआ। लेकिन कैश? कैश तो आया ही नहीं।

इधर ख़र्चे — रेंट, स्टाफ़ तनख़्वाह, बिजली, EMI — ये कैश में देने होते हैं। समय पर। हर महीने। इन ख़र्चों को कॉन्ट्रैक्टर्स के पे करने का इंतज़ार नहीं।

फ़ायदेमंद होकर भी बैंकरप्ट हो सकते हैं। ये थियोरेटिकल जोखिम नहीं है। रोज़ होता है। हर साइज़ के बिज़नेसेज़ के साथ।

एक और उदाहरण:

अंकिता का D2C पहाड़ी फ़ूड ब्रांड इंस्टाग्राम पर अच्छा चल रहा है। मिक्स्ड पिकल के हर जार की लागत ₹120 है (इंग्रीडिएंट्स, जार, लेबल, पैकेजिंग) और ₹299 में बिकता है। शिपिंग (एवरेज ₹70) और प्लेटफ़ॉर्म फ़ीस निकालो तो पर जार मुनाफ़ा ₹80। हर ऑर्डर पर फ़ायदेमंद।

लेकिन समस्या ये है। इंग्रीडिएंट्स बल्क में ख़रीदती है — हर दो महीने ₹60,000 का, क्योंकि सीज़न में सस्ता मिलता है। जार्स और लेबल्स एडवांस में — ₹25,000। ऑर्डर्स COD शिप करती है, कूरियर कंपनी 7-10 दिन में पेमेंट सेटल करती है। रिटर्न्स और रिफ़ंड्स 8% खाते हैं।

तो किसी भी वक़्त ₹60,000 रॉ इंग्रीडिएंट्स में किचन में पड़ा है, ₹25,000 पैकेजिंग मटीरियल में, और ₹35,000-40,000 कूरियर कंपनी के पास ट्रांज़िट में। ₹1.2 लाख का पैसा फँसा है — घाटा्ट नहीं, वेस्ट नहीं, बस साइकल में अटका हुआ।

काग़ज़ पर फ़ायदेमंद है। लेकिन कुछ महीनों में अगला बैच ख़रीदने के पैसे नहीं होते क्योंकि पिछले बैच का कैश पूरा वापस नहीं आया।

सबक: मुनाफ़ा एक अकाउंटिंग कॉन्सेप्ट है। कैश फ़्लो जीवित रहना है।

कैश इनफ़्लो और आउटफ़्लो — पैसा कहाँ जाता है

हर बिज़नेस में पैसे की दो धाराएँ हैं:

पैसा अंदर आना (कैश इनफ़्लोज़)

  • सेल्स से कमाई — ग्राहकों का पेमेंट (कैश, UPI, कार्ड, बैंक ट्रांसफ़र)
  • उधार वसूली — बाक़ी पैसा जो फ़ाइनली आया
  • लोन डिसबर्समेंट — बैंक ने लोन रिलीज़ किया
  • रिफ़ंड्स/डिपॉज़िट्स वापसी — सिक्योरिटी डिपॉज़िट, टैक्स रिफ़ंड
  • ओनर का निवेश — अपनी जेब से बिज़नेस में डाला
  • गवर्नमेंट सब्सिडीज़/ग्रांट्स — अगर एप्लीकेबल हों

पैसा बाहर जाना (कैश आउटफ़्लोज़)

  • रॉ मटीरियल/इन्वेंटरी — स्टॉक ख़रीदना
  • रेंट — दुकान, गोदाम, दफ़्तर
  • तनख़्वाह/वेजेज़ — स्टाफ़ को पेमेंट
  • EMI — लोन की क़िस्त
  • यूटिलिटी बिल्स — बिजली, पानी, इंटरनेट, फ़ोन
  • टैक्सेज़ — GST, आमदनी टैक्स, एडवांस टैक्स
  • ट्रांसपोर्ट/लॉजिस्टिक्स — शिपिंग, डिलीवरी, फ़्यूल
  • मार्केटिंग — ऐड्स, प्रमोशन्स, प्रिंटिंग
  • बनाए रखेंस/रिपेयर्स — इक्विपमेंट फ़िक्स, दुकान का अपकीप
  • पर्सनल ड्रॉइंग्स — अपने लिए निकाला

टाइमिंग की समस्या

कैश फ़्लो की बुनियादी चुनौती है टाइमिंग

पुष्पा दीदी रोज़ सुबह दूध, चीनी, पत्ती ख़रीदती हैं। कैश देती हैं। शाम तक सारी चाय बिक जाती है, कैश आ जाता है। कैश साइकल एक दिन का है। सुबह पैसा गया, शाम को वापस। सिंपल।

भंडारी अंकल डिस्ट्रीब्यूटर से सीमेंट 7 दिन के पेमेंट टर्म पर ख़रीदते हैं। वो सीमेंट कॉन्ट्रैक्टर को 30 दिन के क्रेडिट पर बेचते हैं। तो कॉन्ट्रैक्टर से पेमेंट आने से 23 दिन पहले डिस्ट्रीब्यूटर को पे करना पड़ता है। उन 23 दिनों में पैसा फँसा है।

अब इसे 15-20 एक्टिव कॉन्ट्रैक्टर्स और ₹15-20 लाख मंथली सेल्स से मल्टीप्लाई करो। टाइमिंग गैप एक परमानेंट कैश डेफ़िसिट बनाता है जो कहीं से फ़ंड करना पड़ता है।

आपूर्तिकर्ता को पे करना पड़ता है ग्राहकों के पे करने से पहले। यही ज़्यादातर बिज़नेसेज़ की कोर कैश फ़्लो समस्या है। और बिज़नेस जितना बड़ा होगा, ये गैप उतना बड़ा — जब तक एक्टिवली मैनेज न करो।

क्रेडिट का जाल

क्रेडिट इंडियन बिज़नेस की जान है। और कैश फ़्लो का नंबर वन किलर भी।

"क्रेडिट देना मजबूरी है," भंडारी अंकल बोलते हैं। "हार्डवेयर का बिज़नेस है — कॉन्ट्रैक्टर मटीरियल उठाएगा, बिल्डिंग बनाएगा, बिल्डर से पेमेंट आएगी, तब मुझे देगा। ये चेन है। अगर मैं क्रेडिट नहीं दूँगा, तो कॉन्ट्रैक्टर बग़ल की दुकान चला जाएगा।"

वो सही कह रहे हैं। हार्डवेयर, बिल्डिंग मटीरियल्स, होलसेल — इन सब में क्रेडिट विकल्पल नहीं है। उद्योग ऐसे ही चलती है। लेकिन समस्या यहाँ शुरू होती है:

भंडारी अंकल कॉन्ट्रैक्टर्स को 15-30 दिन का क्रेडिट देते हैं। डिस्ट्रीब्यूटर उन्हें सिर्फ़ 7 दिन देता है।

तो जो क्रेडिट बाहर दे रहे हैं वो ज़्यादा है, जो मिल रहा है उससे। मतलब ग्राहकों के बिज़नेस को अपनी जेब से फ़ाइनेंस कर रहे हैं।

यही क्रेडिट ट्रैप है: क्रेडिट गिवन > क्रेडिट रिसीव्ड = परमानेंट कैश ड्रेन।

नंबर्स कहानी बताते हैं

भंडारी अंकल की क्रेडिट सिचुएशन:

क्रेडिट दिया (अकाउंट्स रिसीवेबल):
  किसी भी वक़्त एवरेज आउटस्टैंडिंग:   ₹4,00,000
  एवरेज कलेक्शन पीरियड:          35-40 दिन
  60 दिन से पुराने अकाउंट्स:           ₹1,45,000

क्रेडिट मिला (अकाउंट्स पेएबल):
  डिस्ट्रीब्यूटर पेमेंट टर्म्स:          7 दिन
  किसी भी वक़्त एवरेज पेएबल:       ₹2,20,000

गैप: ₹1,80,000 हमेशा अपनी जेब से फ़ंड कर रहे हैं।

वो ₹1,80,000 मरा हुआ पैसा है। काम कर रहा है — लेकिन किसी और के बिज़नेस में, उनके अपने में नहीं।

क्रेडिट पॉलिसीज़ बनाना

22 साल में भंडारी अंकल ने सीखा — कभी-कभी तकलीफ़ से — क्रेडिट कैसे सँभालें:

1. क्रेडिट देने से पहले ग्राहक को जानो। नया कॉन्ट्रैक्टर? पहले तीन ऑर्डर कैश ओनली। कोई एक्सेप्शन नहीं। ट्रैक रिकॉर्ड बने, तब क्रेडिट शुरू।

2. साफ़ लिमिट्स रखो। हर ग्राहक को हिस्ट्री के बेसिस पर क्रेडिट लिमिट। रमेश 8 साल से ख़रीद रहा है — ₹1.5 लाख तक। नया कॉन्ट्रैक्टर सोनू — मैक्सिमम ₹50,000।

3. पेमेंट टाइमलाइन एनफ़ोर्स करो। कोई इनवॉइस 45 दिन से ज़्यादा पुराना? पुराना साफ़ होने तक नया क्रेडिट नहीं। ये नियम एनफ़ोर्स करना सबसे मुश्किल है — लेकिन सबसे ज़रूरी भी।

4. सिस्टमैटिकली फ़ॉलो-अप करो। हर रविवार सुबह भंडारी अंकल क्रेडिट रजिस्टर समीक्षा करते हैं। कॉल्स करते हैं। साइट्स पर जाते हैं। ग्राहक के याद करने का इंतज़ार नहीं — ख़ुद याद दिलाते हैं।

5. कुछ बैड डेट स्वीकार करो। हर रुपया वापस नहीं आएगा। भंडारी अंकल क्रेडिट सेल्स का 2-3% पोटेंशियल बैड डेट बजट करते हैं। असली बैड डेट कम रहे, तो अच्छा साल।

"पहले मुझे बुरा लगता था पैसा माँगने में," भंडारी अंकल मानते हैं। "अब समझ आया — अगर मैं नहीं माँगूँगा तो मेरी दुकान बंद हो जाएगी। पैसा माँगना बुरा नहीं है। पैसा ना माँगना — वो बुरा है।"

कैश फ़्लो स्टेटमेंट — सिंपल वर्ज़न

अकाउंटिंग चैप्टर में तीन फ़ाइनेंशियल स्टेटमेंट्स बताए थे। अब कैश फ़्लो स्टेटमेंट पर ध्यान करते हैं — जो बताता है कि बिज़नेस असलीी बच सकता है या नहीं।

सबसे सिंपल वर्ज़न:

ओपनिंग कैश बैलेंस (महीने की शुरुआत)
+ कैश इनफ़्लोज़ (जो कुछ भी आया)
- कैश आउटफ़्लोज़ (जो कुछ भी गया)
= क्लोज़िंग कैश बैलेंस (महीने का अंत)

बस। अगर क्लोज़िंग बैलेंस हेल्दी है, तो ठीक है। अगर हर महीने सिकुड़ रहा है, तो मुसीबत आने वाली है।

मंथली कैश फ़्लो ट्रैकर

एक सिंपल फ़ॉर्मेट जो कोई भी इस्तेमाल कर सकता है — नोटबुक में, एक्सेल में, या ऐप में:

भंडारी अंकल की हार्डवेयर दुकान
कैश फ़्लो — जनवरी

ओपनिंग बैलेंस (1 जनवरी):              ₹1,25,000

इनफ़्लोज़:
  कैश सेल्स                           ₹3,40,000
  क्रेडिट कलेक्शन्स (दिसंबर के)         ₹2,80,000
  कुल इनफ़्लोज़                                    ₹6,20,000

आउटफ़्लोज़:
  सीमेंट/मटीरियल ख़रीदा                ₹3,60,000
  दुकान रेंट                           ₹18,000
  स्टाफ़ तनख़्वाह (2 लोग)                 ₹22,000
  बिजली + फ़ोन                       ₹4,500
  ट्रांसपोर्ट/डिलीवरी                   ₹12,000
  लोन EMI                            ₹15,000
  GST पेमेंट                         ₹28,000
  पर्सनल ड्रॉइंग                     ₹35,000
  फुटकर ख़र्चे                          ₹8,000
  कुल आउटफ़्लोज़                                   ₹5,02,500

क्लोज़िंग बैलेंस (31 जनवरी):             ₹2,42,500
                                        ─────────
इस महीने नेट कैश फ़्लो:                 +₹1,17,500

इससे भंडारी अंकल को पता है: जनवरी ₹1.25 लाख से शुरू हुआ, ₹2.42 लाख पर ख़त्म। कैश फ़्लो पॉज़िटिव रहा। अच्छा महीना।

लेकिन अगर फ़रवरी में क्रेडिट कलेक्शन्स लेट हों? अगर दो बड़े कॉन्ट्रैक्टर्स समय पर पे न करें? इनफ़्लोज़ ₹1.5 लाख गिर जाएँ, और क्लोज़िंग बैलेंस ख़तरनाक तरीक़े से पतला हो जाए।

हर महीने ट्रैक करो। अंदाज़े से नहीं, दिमाग़ में नहीं — असलीी लिखो या ऐप में डालो। कैश फ़्लो समस्याएँ से बंद होने वाले बिज़नेसेज़ लगभग हमेशा वो होते हैं जिन्होंने क्राइसिस आते नहीं देखा।

सीज़नल कैश फ़्लो चुनौतियाँ

उत्तराखंड में लगभग हर बिज़नेस का सीज़न होता है। और सीज़न सिर्फ़ राजस्व प्रभावित नहीं करता — कैश फ़्लो में ड्रामैटिक स्विंग्स लाता है।

नीमा और ज्योति का होमस्टे — दावत और अकाल

मुनस्यारी के पास नीमा और ज्योति के होमस्टे का पैटर्न बिल्कुल साफ़ है:

पीक सीज़न (मार्च-जून): बुकिंग्स फ़ुल। वीकेंड ऑक्यूपेंसी 90-100%। राजस्व: ₹1.5-2 लाख पर मंथ। कैश बढ़िया आ रहा है।

दूसरा पीक (अक्टूबर-नवंबर): ऑटम क्राउड। अच्छी बुकिंग्स। राजस्व: ₹1-1.5 लाख।

मानसून (जुलाई-अगस्त): रास्ते ख़राब, लैंडस्लाइड्स, टूरिस्ट्स नहीं आते। राजस्व गिरकर ₹15,000-20,000। लेकिन ख़र्चे — केयरटेकर तनख़्वाह, बिजली, बनाए रखेंस, EMI — ₹45,000-50,000 पर मंथ चलते रहते हैं।

सर्दी का डेड ज़ोन (दिसंबर-जनवरी): भयंकर ठंड। कभी-कभार ट्रेकर्स के अलावा कोई नहीं। राजस्व: ₹10,000-15,000। ख़र्चे: वही ₹45,000-50,000।

तो साल के चार महीने नीमा और ज्योति कमाई से ₹30,000-35,000 ज़्यादा ख़र्च कर रही हैं। ₹1.2-1.4 लाख कैश कहीं से चाहिए।

रावत जी का सेब का बग़ीचा — एक हार्वेस्ट, बारह महीने के बिल

रावत जी का एपल हार्वेस्ट जुलाई से सितंबर के बीच होता है। उन तीन महीनों में साल की 80-90% कमाई होती है — ₹6-8 लाख ट्रेडर्स और APMC मंडियों में बेचकर।

लेकिन ख़र्चे पूरे साल: छँटाई (जनवरी-फ़रवरी), स्प्रेइंग और फ़र्टिलाइज़र्स (मार्च-मई), हार्वेस्ट की लेबर (जुलाई-सितंबर), कोल्ड स्टोरेज (सितंबर-नवंबर), ट्रांसपोर्ट, पैकेजिंग, और अपना गुज़ारा — हर महीने।

अगर हार्वेस्ट के महीनों से काफ़ी पैसा नहीं बचाया, तो फ़रवरी तक साहूकार से उधार ले रहे हैं। 2-3% पर मंथ ब्याज। जो अगले साल के मुनाफ़ा में से कटता है। ये विशियस साइकल है।

पुष्पा दीदी का चाय स्टॉल — टूरिस्ट टाउन का रिदम

ऋषिकेश का अपना साइकल है। फ़रवरी से मई: टूरिस्ट सीज़न, योगा क्राउड, राफ़्टिंग शुरू। अक्टूबर-नवंबर: मानसून के बाद रश। दिसंबर-जनवरी: स्लो लेकिन स्टेडी (योगा स्टूडेंट्स सर्दियों में भी रहते हैं)।

जुलाई-अगस्त मानसून और जून की भयंकर गर्मी: टूरिस्ट्स 50-60% कम। पुष्पा दीदी 100 कप्स से गिरकर 40-50 पर आ जाती हैं।

लीन मंथ्स की योजना

समाधान बहुत सिंपल है लेकिन करना मुश्किल: अच्छे महीनों में बचाओ ताकि ख़राब महीनों में टिक सको।

व्यावहारिक नियम:

  1. अपने लीन मंथ्स जानो। हर बिज़नेस के होते हैं। पहचानो।
  2. मंथली जीवित रहना लागत गणना करो। मिनिमम कितना चाहिए? नीमा और ज्योति के लिए ₹45,000-50,000।
  3. सीज़नल बफ़र रखो। पीक मंथ्स में राजस्व का 20-30% अलग अकाउंट में डालो। छुओ मत।
  4. लीन मंथ्स में ख़र्चे कम करो। डिस्क्रीशनरी स्पेंडिंग बंद। ज़रूरी नहीं है तो बनाए रखेंस बाद में। अगर मुमकिन हो तो सीज़नल रेंट नेगोशिएट करो।
  5. ऑफ़-सीज़न राजस्व ढूँढो। नीमा रिमोट वर्कर्स के लिए सर्दियों में रियायती लॉन्ग-स्टे पैकेजेज़ पेशकश करती हैं। रावत जी ड्राइड एपल चिप्स और एपल साइडर विनेगर साल भर बेचते हैं। पुष्पा दीदी ने लोकल्स के लिए थाली शुरू की ताकि नॉन-टूरिस्ट राजस्व बना रहे।

"पहले हम पीक सीज़न में सब ख़र्च कर देते थे," नीमा बोलती है। "नया फ़र्नीचर ले लिया, रेनोवेशन कर लिया। फिर मानसून में टेंशन होती थी। अब पहले मानसून का पैसा अलग रखते हैं, उसके बाद ही ख़रीदारी करते हैं।"

वर्किंग कैपिटल प्रबंधन

वर्किंग कैपिटल वो पैसा है जो बिज़नेस को रोज़मर्रा चलाने के लिए चाहिए। टैंक में फ़्यूल समझो।

वर्किंग कैपिटल = करंट एसेट्स - करंट लायबिलिटीज़

करंट एसेट्स: कैश, इन्वेंटरी, लोगों ने जो देना है (रिसीवेबल्स)। करंट लायबिलिटीज़: जो दूसरों को शॉर्ट-टर्म देना है (पेएबल्स, EMIs)।

ऑपरेटिंग साइकल

हर बिज़नेस का ऑपरेटिंग साइकल होता है — पैसा बाहर जाने से वापस आने तक का टाइम:

ख़रीदो → स्टॉक/बनाओ → बेचो → वसूल करो

पुष्पा दीदी:

  • दूध-सप्लाइज़ ख़रीदो (सुबह) → चाय बनाओ → चाय बेचो → कैश लो (शाम)
  • साइकल: 1 दिन। वर्किंग कैपिटल लगभग नहीं चाहिए।

भंडारी अंकल:

  • डिस्ट्रीब्यूटर से सीमेंट ख़रीदो → दुकान में स्टॉक → कॉन्ट्रैक्टर को बेचो → पेमेंट वसूल करो (30-45 दिन बाद)
  • साइकल: 37-52 दिन। काफ़ी वर्किंग कैपिटल चाहिए।

अंकिता का D2C ब्रांड:

  • इंग्रीडिएंट्स ख़रीदो (सीज़नल बल्क) → स्टोर → पिकल बनाओ → पैक → शिप → कूरियर COD कलेक्ट करे → कूरियर पेमेंट सेटल करे (डिलीवरी के 7-10 दिन बाद)
  • साइकल: 60-90 दिन। बहुत ज़्यादा वर्किंग कैपिटल चाहिए।

तीन नंबर्स ट्रैक करो

इन्वेंटरी डेज़: स्टॉक बिकने से पहले कितने दिन पड़ा रहता है?

  • भंडारी अंकल: सीमेंट 10-15 दिन में बिक जाता है, लेकिन कुछ आइटम्स 60+ दिन पड़े रहते हैं।
  • कम करो: ओवरस्टॉक मत करो। छोटे-छोटे ऑर्डर्स ज़्यादा बार दो।

डेब्टर डेज़: ग्राहकों पे करने में कितने दिन लेते हैं?

  • भंडारी अंकल: एवरेज 35-40 दिन।
  • कम करो: क्रेडिट पॉलिसीज़ एनफ़ोर्स करो। अर्ली पेमेंट छूट पेशकश करो।

क्रेडिटर डेज़: आपूर्तिकर्ता कितने दिन देते हैं पे करने के लिए?

  • भंडारी अंकल: डिस्ट्रीब्यूटर से 7 दिन।
  • बढ़ाओ: बेटर टर्म्स नेगोशिएट करो। रिलायबल पेमेंट का ट्रैक रिकॉर्ड बनाओ।

फ़ॉर्मूला:

कैश फँसा हुआ = इन्वेंटरी डेज़ + डेब्टर डेज़ - क्रेडिटर डेज़

भंडारी अंकल: 15 + 40 - 7 = 48 दिन का कैश साइकल में फँसा है। 48 दिनों के ख़र्चे अपनी जेब से फ़ंड करने पड़ते हैं।

गोल: ये नंबर छोटा करो। तेज़ इन्वेंटरी टर्न्स। तेज़ कलेक्शन्स। लंबे आपूर्तिकर्ता टर्म्स।

बिज़नेस का इमरजेंसी फ़ंड

अगर COVID ने स्मॉल बिज़नेस ओनर्स को एक सबक सिखाया, तो ये: कैश रिज़र्व ज़रूरी है।

जब मार्च 2020 में पहला लॉकडाउन आया, भंडारी अंकल की दुकान 68 दिन बंद रही। कोई राजस्व नहीं। लेकिन रेंट देना था। स्टाफ़ को तनख़्वाह देनी थी। लोन EMI बंद नहीं हुई।

वो बच गए क्योंकि बिज़नेस सेविंग्स अकाउंट में ₹2.5 लाख पड़े थे — पिछले दो साल में, लगभग मन मारकर, बचाए हुए। "बीवी बोलती थी, पैसे बैंक में क्यों पड़ा रखा है, कुछ करो। आज वो पैसा ही काम आया।"

नीमा और ज्योति इतनी तैयार नहीं थीं। फ़ैमिली से ₹1.5 लाख उधार लेना पड़ा होमस्टे चालू रखने के लिए। 18 महीने लगे वापस करने में।

कितना रखना चाहिए

नियम ऑफ़ थम्ब: कुल ख़र्चों के 2-3 महीने।

बिज़नेसमंथली ख़र्चेइमरजेंसी फ़ंड लक्ष्य
पुष्पा दीदी का चाय स्टॉल~₹60,000₹1.2-1.8 लाख
भंडारी अंकल की हार्डवेयर दुकान~₹5 लाख₹10-15 लाख
नीमा का होमस्टे~₹50,000₹1-1.5 लाख
अंकिता का D2C ब्रांड~₹80,000₹1.6-2.4 लाख

कहाँ रखना चाहिए

  • सेविंग्स अकाउंट — तुरंत एक्सेस। ब्याज कम (3-4%) लेकिन लिक्विड।
  • लिक्विड म्यूचुअल फ़ंड — थोड़ा बेहतर रिटर्न (5-6%)। 1-2 बिज़नेस डेज़ में पैसा मिल जाता है।
  • FD विद प्रीमैच्योर विड्रॉअल — बेहतर ब्याज। ज़रूरत हो तो तोड़ लो।

इमरजेंसी फ़ंड यहाँ मत रखो:

  • शेयर मार्केट (बहुत वोलाटाइल)
  • रियल एस्टेट (जल्दी बेच नहीं सकते)
  • कैश ड्रॉअर (ख़र्च करने का टेम्पटेशन बहुत ज़्यादा)
  • पर्सनल अकाउंट (बिज़नेस और पर्सनल मनी = अलग)

"इमरजेंसी फ़ंड बोरिंग लगता है," अंकिता मानती है। "उससे कुछ एक्साइटिंग नहीं होता। लेकिन जब कूरियर कंपनी ने तीन हफ़्ते पेमेंट्स रोकी थी एक बार, तब वो बोरिंग पैसा ही काम आया।"

कैश फ़्लो मैनेज करने के टूल्स

फ़ैंसी सॉफ़्टवेयर की ज़रूरत नहीं। सिस्टम चाहिए — कुछ जो लगातारली करो।

लेवल 1: नोटबुक मेथड

सिंपल नोटबुक, चार कॉलम्स: डेट, डिस्क्रिप्शन, मनी इन, मनी आउट। रोज़ अपडेट। हर हफ़्ते कुल। हर महीने समीक्षा।

पुष्पा दीदी ने यहीं से शुरू किया। काम करता है।

लेवल 2: एक्सेल / गूगल शीट्स

सिंपल स्प्रेडशीट, मंथली टैब्स। हर रो एक ट्रांज़ैक्शन। ऑटो-सम फ़ॉर्मूलाज़। एक समरी शीट जो मंथ-बाय-मंथ कैश फ़्लो ट्रेंड दिखाए।

विक्रम गूगल शीट्स इस्तेमाल करता है फ़्रेंचाइज़ी के लिए। रोज़ 15 मिनट अपडेट। हर संडे समीक्षा करने पर साफ़ पिक्चर।

लेवल 3: ऐप्स — खताबुक, व्यापार

खताबुक: किसने कितना देना है, किसको कितना देना है — ट्रैक करने के लिए बेस्ट। व्हाट्सऐप पर अपने-आप पेमेंट रिमाइंडर्स। फ़्री। हिंदी इंटरफ़ेस। भंडारी अंकल जैसे दुकानदारों के लिए बिल्कुल सही।

व्यापार: ज़्यादा फ़ीचर्स — इनवॉइसिंग, इन्वेंटरी, GST बिलिंग, ख़र्चा ट्रैकिंग, रिपोर्ट्स। जिन बिज़नेसेज़ को सही बिलिंग चाहिए उनके लिए अच्छा। फ़्री बुनियादी वर्ज़न।

दोनों सिंपल स्मार्टफ़ोन पर चलते हैं। अकाउंटिंग नॉलेज ज़रूरी नहीं।

लेवल 4: टैली / ज़ोहो बुक्स

ज़्यादा राजस्व वाले, GST कम्प्लायंस ज़रूरी, रोज़ कई ट्रांज़ैक्शन्स — इनके लिए। ये अपने-आप सही कैश फ़्लो स्टेटमेंट बनाते हैं।

सबसे ज़रूरी हैबिट

वीकली कैश समीक्षा।

हर रविवार (या जो दिन सूट करे), 30 मिनट बैठो और तीन सवालों का जवाब दो:

  1. अभी मेरे पास कितना कैश है? (बैंक + कैश ड्रॉअर)
  2. इस हफ़्ते कौन सी पेमेंट्स ड्यू हैं?
  3. कौन सी कलेक्शन्स एक्स्पेक्ट कर रहा हूँ?

अगर सवाल 2 > सवाल 1 + सवाल 3, तो समस्या है — और एक हफ़्ता है हल करने के लिए।

भंडारी अंकल ये समीक्षा हर रविवार सुबह करते हैं, दुकान खुलने से पहले। पिछले 8 साल से, जब से एक बार डिस्ट्रीब्यूटर को पे नहीं कर पाए और रिश्ता ख़राब होते-होते बची। "संडे की चाय के साथ एक घंटा — बस इतना लगता है। और पूरे हफ़्ते की टेंशन ख़त्म।"

कैश फ़्लो किलर्स — वो ग़लतियाँ जो कैश सुखा देती हैं

ये वो ग़लतियाँ हैं जो अदरवाइज़ हेल्दी बिज़नेसेज़ का कैश ख़त्म कर देती हैं:

1. ज़रूरत से ज़्यादा स्टॉक

भंडारी अंकल ने एक बार 200 बैग्स व्हाइट सीमेंट ख़रीद लिए क्योंकि डिस्ट्रीब्यूटर ने बल्क पर 5% ऑफ़ दिया। बेचने में 4 महीने लगे। ₹1.6 लाख उनकी दुकान में सीमेंट के बैग्स की शक्ल में पड़ा रहा, बैंक में कैश की बजाय।

नियम: उतना ही ख़रीदो जो वजहेबल टाइम में बिक सके। 5% छूट मीनिंगलेस है अगर कैश महीनों तक फँसा रहे।

2. ज़्यादा क्रेडिट देना

कवर कर चुके हैं। लेकिन दोहराना ज़रूरी: हर रुपया जो क्रेडिट में दिया, वो आपका कैश है जो आपके काम नहीं आ रहा।

3. पर्सनल और बिज़नेस ख़र्चे मिलाना

पुष्पा दीदी मानती हैं कि पहले कैश ड्रॉअर से ₹500-1,000 घर के ख़र्चे के लिए निकाल लेती थीं बिना लिखे। महीने में ₹15,000-30,000 बिज़नेस से "ग़ायब" हो जाता था। समझ नहीं आता था कि स्टॉल अच्छा चल रहा है फिर भी कैश टाइट क्यों लगता है।

फ़िक्स: अपने लिए फ़िक्स्ड मंथली ड्रॉइंग निकालो। दर्ज करो। बाक़ी सब बिज़नेस अकाउंट में।

4. देर से इनवॉइसिंग/बिलिंग

बिल जल्दी नहीं भेजोगे, तो पेमेंट जल्दी कैसे आएगी? हर दिन इनवॉइस भेजने में देर = कलेक्शन साइकल में एक दिन बढ़ा।

अंकिता पहले ऑर्डर्स उसी दिन पैक और शिप करती थी, लेकिन इनवॉइस 3-4 दिन बाद भेजती थी क्योंकि बिज़ी रहती थी। पेमेंट ट्रैकिंग लेट शुरू होती थी, और जो ग्राहक 7 दिन में पे करता वो 10-11 दिन लेने लगा।

5. छोटी-छोटी लीक्स इग्नोर करना

₹200 यहाँ, ₹500 वहाँ। रॉ मटीरियल वेचरण। चोरी। फ़ालतू सब्सक्रिप्शन्स। ऑटो राइड्स जो कंबाइन हो सकती थीं। अकेली नज़र में छोटी लगती हैं, महीनों में बड़ी हो जाती हैं।

"मैंने एक बार गणना किया," विक्रम बताता है। "छोटी-छोटी लीकेजेज़ — एक्स्ट्रा पैकेजिंग मटीरियल वेस्ट, फ़ूड आइटम्स एक्सपायर हो गए, डुप्लीकेट परचेज़ेज़ — महीने में ₹8,000-10,000 होता था। साल का ₹1 लाख। वो तो मेरा एक महीने का मुनाफ़ा है।"

6. टैक्स की योजना नहीं करना

GST पेमेंट्स, एडवांस टैक्स, TDS — ये बड़े, प्रिडिक्टेबल आउटफ़्लोज़ हैं। अगर क्वार्टर भर पैसा अलग नहीं रखा, तो ड्यू डेट आए और अचानक ₹50,000-1,00,000 एक साथ निकालना पड़े।

फ़िक्स: राजस्व आते ही एस्टिमेटेड टैक्स परसेंटेज अलग अकाउंट में रखो। टैक्स ड्यू हो तो पैसा रेडी हो।

क्विक फ़िक्सेज़ — जब कैश टाइट हो

कभी-कभी सारी योजना के बावजूद कैश क्रंच आ जाता है। बिल्स ड्यू हैं, कलेक्शन्स नहीं आई, अभी समाधान चाहिए। अनुभव्ड बिज़नेस ओनर्स क्या करते हैं:

1. आपूर्तिकर्ता से पेमेंट टर्म्स नेगोशिएट करो

"पहली बार मुझे डिस्ट्रीब्यूटर को बोलना पड़ा — 'भाई, इस बार 15 दिन और दे दो,'" भंडारी अंकल याद करते हैं। "डर लगता था। लेकिन डिस्ट्रीब्यूटर ने कहा — 'भंडारी जी, 22 साल से ले रहे हो, एक बार लेट हो तो क्या हुआ।' उस दिन समझ आया — रिश्ता है तो नेगोशिएट हो सकता है।"

ज़्यादातर आपूर्तिकर्ता रिलायबल ग्राहक खोने से ज़्यादा, एक्स्ट्रा टाइम देना प्रेफ़र करते हैं। लेकिन डेडलाइन से पहले माँगो, बाद में नहीं।

2. अर्ली पेमेंट पर छूट पेशकश करो

क्रेडिट ग्राहकों से बोलो: 30 की बजाय 7 दिन में पे करो, 2% ऑफ़। मार्जिन 2% कम हुआ, लेकिन 23 दिन का कैश मिल गया। ₹1 लाख इनवॉइस पर ₹2,000 की लागत से ₹98,000 तीन हफ़्ते पहले मिले। अक्सर वर्थ इट।

3. इन्वेंटरी ज़रूरी्स तक कम करो

जो इस हफ़्ते बिकने वाला नहीं, वो मत ख़रीदो। स्लो-मूविंग आइटम्स के ऑर्डर्स कैंसल या पोस्टपोन करो। एक्स्ट्रा स्टॉक पर छूट देकर कैश बनाओ।

4. शॉर्ट-टर्म ओवरड्राफ़्ट फ़ैसिलिटी इस्तेमाल करो

अगर बैंक में करंट अकाउंट है, तो ओवरड्राफ़्ट (OD) फ़ैसिलिटी के बारे में पूछो। बैलेंस से ज़्यादा टेम्पररिली निकाल सकते हो — असल में शॉर्ट-टर्म लोन। इंटरेस्ट रेट ज़्यादा (12-15%), लेकिन सिर्फ़ उतने पर देना है जितना असलीी इस्तेमाल किया, जितने दिन इस्तेमाल किया।

भंडारी अंकल के पास ₹3 लाख की OD फ़ैसिलिटी है। साल में 3-4 बार इस्तेमाल करते हैं, कुछ दिनों के लिए। "इंश्योरेंस समझो — अगर एक हफ़्ते का गैप है, तो OD से काम चला लो। लेकिन हैबिट मत बनाओ।"

5. डिस्क्रीशनरी ख़र्चे तुरंत बंद करो

जब कैश टाइट हो, हर ग़ैर-ज़रूरी ख़र्चा रुक जाता है। वो प्लान्ड रेनोवेशन? बाद में। नया साइनबोर्ड? और बाद में। स्टाफ़ आउटिंग? अगली क्वार्टर।

नीमा ने मानसून सीज़न में सीखा: "जुलाई-अगस्त में सिर्फ़ जीवित रहना ख़र्चे। कोई नया फ़र्नीचर नहीं, कोई डेकोरेशन नहीं। बस बिजली, तनख़्वाह, और EMI। बाक़ी सब अक्टूबर तक रुक सकता है।"

6. कलेक्शन्स तेज़ करो

सबसे बड़े डेब्टर्स को कॉल करो। ज़रूरत हो तो उनके पास जाओ। पोलाइट रहो लेकिन पर्सिस्टेंट। कभी-कभी कॉन्ट्रैक्टर की साइट पर पहुँचना ही काफ़ी होता है — वो चेक जो तीन हफ़्ते से "पेंडिंग" थी, मिल जाती है।

7. इनवॉइस छूटिंग / फ़ैक्टरिंग कंसीडर करो

बड़े बिज़नेसेज़ के लिए: कुछ NBFC और फ़िनटेक कंपनियाँ अनपेड इनवॉइसेज़ छूट पर ख़रीद लेती हैं। आपको इनवॉइस वैल्यू का 80-90% तुरंत मिल जाता है; वो ग्राहक से कलेक्ट करती हैं। 2-5% घाटा, लेकिन कैश अभी। KredX और TReDS जैसी सेवाएँ ये फ़ैसिलिटेट करती हैं।


सब मिलाकर

शुक्रवार आ गया। भंडारी अंकल ने ₹1,80,000 डिस्ट्रीब्यूटर के लिए जुटा लिए। कैसे?

तिवारी बिल्डर को पर्सनली कॉल नहीं किया — साइट पर गए। इनवॉइस दिखाया। "तिवारी साहब, आपका काम कभी नहीं रुका मैंने। ये पेमेंट ज़रूरी है।" तिवारी ने ₹80,000 वहीं दे दिए।

OD फ़ैसिलिटी से ₹55,000 लिए — इस साल पहली बार।

बिज़नेस सेविंग्स अकाउंट से ₹45,000 — वो इमरजेंसी फ़ंड जो COVID के बाद बनाना शुरू किया था।

डिस्ट्रीब्यूटर को पेमेंट हो गई। समय पर।

उस शाम, दुकान बंद करने के बाद, भंडारी अंकल क्रेडिट रजिस्टर में नया पेज खोलते हैं। ऊपर लिखते हैं:

"नया नियम: कोई भी क्रेडिट 30 दिन से ज़्यादा नहीं। कोई एक्सेप्शन नहीं।"

वो जानते हैं एनफ़ोर्स करना मुश्किल होगा। कुछ कॉन्ट्रैक्टर्स तकलीफ़ करेंगे। कुछ शायद बग़ल की दुकान चले जाएँ। लेकिन ये भी जानते हैं: बग़ल की दुकान पिछले साल बंद हुई। कैश फ़्लो समस्याएँ से।

वो अगले नहीं बनना चाहते।


इस चैप्टर की ज़रूरी बातें:

  1. कैश फ़्लो मुनाफ़ा नहीं है। फ़ायदेमंद होकर भी कैश ख़त्म हो सकता है। दोनों ट्रैक करो।
  2. टाइमिंग गैप बिज़नेसेज़ बंद करता है। आपूर्तिकर्ता को ग्राहकों से पहले पे करना पड़ता है। ये गैप एक्टिवली सँभालो।
  3. क्रेडिट ज़रूरी है, लेकिन ख़तरनाक। पॉलिसीज़ बनाओ, लिमिट्स एनफ़ोर्स करो, हर हफ़्ते फ़ॉलो-अप।
  4. मंथली कैश फ़्लो ट्रैक करो। ओपनिंग बैलेंस + इनफ़्लोज़ - आउटफ़्लोज़ = क्लोज़िंग बैलेंस। लिखो।
  5. सीज़नल बिज़नेसेज़ को सीज़नल योजना चाहिए। पीक मंथ्स में बचाओ। लीन मंथ्स में टिको।
  6. वर्किंग कैपिटल डेली फ़्यूल है। इन्वेंटरी डेज़ + डेब्टर डेज़ - क्रेडिटर डेज़ = कैश कितने दिन फँसा है।
  7. इमरजेंसी फ़ंड रखो। 2-3 महीने के ख़र्चे। COVID के बाद नॉन-नेगोशिएबल।
  8. वो टूल इस्तेमाल करो जो काम आए। नोटबुक, स्प्रेडशीट, ऐप — "दिमाग़ में" से कुछ भी बेहतर।
  9. कैश फ़्लो किलर्स पहचानो। ओवरस्टॉकिंग, ज़्यादा क्रेडिट, पर्सनल ख़र्चे मिक्स्ड, लेट बिलिंग।
  10. कैश टाइट हो तो तेज़ी से एक्ट करो। आपूर्तिकर्ता से नेगोशिएट, कलेक्शन्स एक्सेलरेट, ग़ैर-ज़रूरी ख़र्चे बंद।

अगले चैप्टर में देखेंगे कि बिना एक्सटर्नल फ़ंडिंग के बिज़नेस कैसे बढ़ाएँ — कोई VC नहीं, कोई एंजल निवेशक नहीं, बस बिज़नेस जो कैश जेनरेट करता है उससे। बूटस्ट्रैपिंग, मुनाफ़े रीनिवेश करना, और स्टेडी बढ़त की कला। भंडारी अंकल 22 साल से ये कर रहे हैं। कैसे — वो अगले चैप्टर में।