सेल्स — बेचना कैसे सीखें
ठेकेदार, सीमेंट, और हाथ मिलाना
गुरुवार की दोपहर है हल्द्वानी में, और एक सफ़ेद Bolero भंडारी अंकल की हार्डवेयर दुकान के बाहर रुकती है। धूल भरी शर्ट में एक आदमी उतरता है — महेश जोशी, कॉन्ट्रैक्टर। रुद्रपुर के पास एक नई कॉलोनी में छह घर बना रहे हैं। सीमेंट, TMT बार्स, सेनेटरी फ़िटिंग्स, इलेक्ट्रिकल वायरिंग, PVC पाइप्स — सब चाहिए। कुल ऑर्डर ₹4-5 लाख का होगा।
महेश अंदर आते हैं। भंडारी अंकल सीधा उत्पाद दिखाना शुरू नहीं करते। पहले कुर्सी और पानी पेशकश करते हैं। फिर पूछते हैं: "जोशी जी, कितने घर चल रहे हैं अभी? फ़ाउंडेशन लेवल पर हैं या ऊपर आ गए?"
ये स्मॉल टॉक नहीं है। वो समझ रहे हैं कि महेश को अभी क्या चाहिए और अगले तीन महीनों में क्या लगेगा।
महेश बताते हैं — चार घर फ़ाउंडेशन पर, दो फ़र्स्ट फ़्लोर पर। भंडारी अंकल दिमाग़ में गणना कर लेते हैं। उन्हें पता है हर चरण में कितने बोरे सीमेंट और कितने टन्स स्टील लगता है। एक काग़ज़ पर लिस्ट लिखते हैं — फ़ॉर्मल कोटेशन नहीं, रफ़ प्लान।
"पहले फ़ेज़ में इतना लगेगा। दूसरे में इतना। मैं आपको 20 दिन का क्रेडिट दे दूँगा — लेकिन पेमेंट टाइम पर चाहिए, जोशी जी।"
महेश सिर हिलाते हैं। दाम तय होता है। हाथ मिलाते हैं। डन. ₹4.5 लाख का ऑर्डर, 15 मिनट में।
भंडारी अंकल ने एक भी "सेल्स टेक्नीक" नहीं इस्तेमाल की। कोई पिच डेक नहीं। कोई पावरपॉइंट नहीं। लेकिन जो उन्होंने किया — ग्राहक को समझना, सही क्वेश्चन्स पूछना, सही टाइम पर सही समाधान देना, टर्म्स साफ़ रखना — यही सेलिंग है। बस वो इसे ये नाम नहीं देते।
हर बिज़नेस सेल्स पर चलता है। आपका उत्पाद बेहतरीन हो, जगह बढ़िया हो, दाम सही हो — लेकिन अगर बेच नहीं सकते, तो कुछ मायने नहीं रखता। राजस्व सेल्स से आता है। कैश फ़्लो सेल्स से आता है। रेंट, भंडार, तनख़्वाह, घर का ख़र्चा — सब सेल्स से चलता है।
और सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी ये है: सेलिंग मतलब ज़बरदस्ती या चालाकी नहीं है। सेलिंग मतलब सामने वाले की ज़रूरत समझना और उसे पूरी करना।
ये चैप्टर बताएगा कि कैसे बेचें — चाहे हार्डवेयर की दुकान हो, चाय का स्टॉल, होमस्टे, इंस्टाग्राम ब्रांड, या सेब का बग़ीचा।
सब पहले से बेच रहे हैं
आप बोलोगे, "मैं सेल्सपर्सन नहीं हूँ।" लेकिन हो।
पुष्पा दीदी ऋषिकेश में चाय बेचती हैं। बाहर खड़ी होकर चिल्लाती नहीं। ग्राहक आता है तो स्माइल करती हैं, रेग्युलर्स की पसंद याद रखती हैं ("आपको कम चीनी, ना?"), स्टॉल हमेशा साफ़ रहता है। वो गर्मजोशी, वो याददाश्त, वो निरंतरता — ये सब सेल्स हुनर हैं।
अंकिता इंस्टाग्राम पर पहाड़ी चटनी और अचार बेचती हैं। डोर टू डोर नहीं जाती। विलेजेज़ में सोर्सिंग ट्रिप्स की स्टोरीज़ डालती हैं, प्रोडक्शन प्रक्रिया दिखाती हैं, हर DM का एक घंटे में रिप्लाई करती हैं। स्टोरीटेलिंग, ट्रांसपेरेंसी, रिस्पॉन्सिवनेस — ये सब सेल्स हुनर हैं।
नीमा और ज्योति मुनस्यारी में होमस्टे चलाती हैं। TV ऐड नहीं देतीं। गेस्ट्स जाते वक़्त गूगल समीक्षा माँगती हैं। एक महीने बाद व्हाट्सऐप मैसेज भेजती हैं: "Hope you're doing well! मुनस्यारी अभी बहुत सुंदर है।" फ़ॉलो-अप, पर्सनल टच — ये सेल्स हुनर हैं।
रावत जी रानीखेत से सेब बेचते हैं। मंडी ट्रेडर कम दाम बोलता है तो शांत से कहते हैं: "भाई, शिमला का एप्पल देखो और मेरा देखो। साइज़ और टेस्ट तुलना करो। ये दाम फ़ेयर है।" उत्पाद नॉलेज से बैक्ड आत्मविश्वास — ये सेल्स हुनर है।
सेल्स डिग्री नहीं चाहिए। लोगों को समझो, अपना उत्पाद जानो, और साफ़ बात करो। यही इस चैप्टर की बात है।
ग्राहक को समझो
कुछ भी बेचने से पहले तीन क्वेश्चन्स का जवाब चाहिए:
- कौन हैं ये? — किस तरह का पर्सन या बिज़नेस है आपका ग्राहक?
- इन्हें क्या चाहिए? — जो आप बेचना चाहते हो वो नहीं, जो ये चाहते हैं।
- इन्हें किसकी चिंता है? — कौन सा डर, डाउट, या कंस्ट्रेंट इन्हें ख़रीदने से रोक रहा है?
भंडारी अंकल अपने ग्राहकों को जानते हैं
22 साल से कॉन्ट्रैक्टर्स से डील करते-करते भंडारी अंकल को पता है:
- कौन हैं: छोटे-मध्यम कॉन्ट्रैक्टर्स जो हल्द्वानी, रुद्रपुर, और आसपास के इलाक़ों में रेज़िडेंशियल मकान बनाते हैं। ज़्यादातर एक वक़्त में 3-8 प्रोजेक्ट्स सँभालते हैं।
- क्या चाहिए: भरोसेमंद आपूर्ति। अगर सीमेंट टाइम पर नहीं पहुँचा तो लेबर बैठा रहता है, पैसे डूबते हैं। गुणवत्ता लगातार चाहिए — ख़राब फ़िटिंग्स पर कम्प्लेंट आए तो ब्लेम आपूर्तिकर्ता पर जाता है।
- चिंता किसकी: कैश फ़्लो। कॉन्ट्रैक्टर्स को होमओनर्स इंस्टॉलमेंट्स में पे करते हैं। बीच के गैप के लिए आपूर्तिकर्ता से क्रेडिट चाहिए। दाम फ़्लक्चुएशन भी टेंशन है — प्रोजेक्ट के बीच सीमेंट महँगा हो गया तो मार्जिन ख़त्म।
क्योंकि भंडारी अंकल ये सब समझते हैं, वो सिर्फ़ उत्पाद नहीं बेचते — समस्याएँ हल करते हैं। ट्रस्टेड कॉन्ट्रैक्टर्स को क्रेडिट देते हैं। दाम बढ़ने से पहले कॉल करते हैं: "जोशी जी, सीमेंट अगले हफ़्ते ₹15 बढ़ने वाला है — एडवांस ऑर्डर दे दो तो आज के रेट पर लॉक कर देता हूँ।"
ये सेल्समैनशिप नहीं है। ये साझेदारी है। और इसीलिए कॉन्ट्रैक्टर्स सालों-साल उनके पास वापस आते हैं।
नीमा अपने टूरिस्ट्स को जानती हैं
नीमा और ज्योति के होमस्टे में अलग-अलग टाइप के गेस्ट्स आते हैं:
- कपल्स और यंग ट्रैवलर्स — इंस्टाग्राम-वर्दी व्इस्तेमाल, क्लीन रूम्स, लोकल फ़ूड अनुभव चाहिए। दाम-सेंसिटिव हैं लेकिन "अनुभव" के लिए पे करने को तैयार।
- फ़ैमिलीज़ विद किड्स — सेफ़्टी, हॉट वॉटर, स्पेस चाहिए। लॉन्गर चरण़ बुक करते हैं।
- कॉर्पोरेट ग्रुप्स — Wi-Fi, बड़ा आम इलाक़ा, ईज़ी बुकिंग चाहिए।
नीमा सबको एक ही चीज़ पेशकश नहीं करतीं। कपल्स को बॉनफ़ायर डिनर प्रमोट करती हैं। फ़ैमिलीज़ को सेफ़ ट्रेक वाला मेडो बताती हैं। कॉर्पोरेट ग्रुप्स को कॉन्फ़्रेंस स्पेस और टीम एक्टिविटीज़ की बात करती हैं।
सेम होमस्टे। ग्राहक अलग, पिच अलग।
ज़रूरी बात: जब तक ग्राहक को नहीं जानोगे, अच्छे से बेच नहीं पाओगे। सेल्स पिच से पहले ग्राहक को समझने में टाइम लगाओ। ज़रूरतें और चिंताएँ समझ गए तो पिच ख़ुद बन जाएगी।
सेल्स कन्वर्सेशन — बातचीत कैसे करें
ज़्यादातर लोग सोचते हैं सेलिंग मतलब बोलते रहो — फ़ीचर्स गिनाओ, फ़ायदे लिस्ट करो, क्लेम्स करो। लेकिन बेस्ट सेल्सपीपल इसका उल्टा करते हैं।
पहले सुनो, बाद में बोलो
एक टूरिस्ट पुष्पा दीदी की स्टॉल पर आता है: "एक चाय देना।" ज़्यादातर स्टॉल वाले चाय बनाकर दे देंगे। पुष्पा दीदी बोलती हैं: "चाय तो मिलेगी — अदरक वाली या इलायची वाली? और कुछ खाना है तो आज पकौड़े फ़्रेश बने हैं।"
ग्राहक ने एक चीज़ बोली (चाय), पुष्पा दीदी ने बातचीत खोली जिसमें स्नैक ऑर्डर भी आ सकता है। पुश नहीं किया — विकल्प दिया।
बड़ी सेल्स में भी सेम प्रिंसिपल काम करता है। जब भंडारी अंकल किसी नए कॉन्ट्रैक्टर से मिलते हैं तो "मेरे पास बेस्ट सीमेंट है, बेस्ट दाम है" से शुरू नहीं करते। पूछते हैं:
- "क्या बना रहे हो?"
- "कब तक कम्प्लीट करना है?"
- "कितना मटीरियल लगेगा रफ़ली?"
- "पहले कहाँ से लेते थे?"
हर क्वेश्चन इनफ़ॉर्मेशन देता है। हर आंसर से पेशकश कस्टमाइज़ होता है।
क्वेश्चन्स पूछो, लेक्चर मत दो
सेल्स कन्वर्सेशन के लिए आसान फ़्रेमवर्क:
- सिचुएशन पूछो — क्या करना है? टाइमलाइन क्या है?
- समस्याएँ पूछो — क्या काम नहीं कर रहा? किससे ख़ुश नहीं हैं?
- असर पूछो — ये समस्या हल नहीं हुई तो क्या होगा?
- तब — और तभी — समाधान बताओ — दिखाओ कि आपका उत्पाद/सेवा उनकी ख़ास सिचुएशन में कैसे फ़िट करता है।
ऑब्जेक्शन्स सँभालना
हर ग्राहक के मन में डाउट्स होते हैं। ये सामान्य है। सबसे आम ऑब्जेक्शन्स:
"दाम बहुत ज़्यादा है"
तुरंत छूट मत दो। पहले समझो क्यों ज़्यादा लग रहा है।
- चीपर कॉम्पिटिटर से तुलना कर रहे हैं? गुणवत्ता डिफ़रेंस समझाओ।
- सच में बजट से बाहर है? छोटी क्वांटिटी या पेमेंट प्लान पेशकश करो।
- बस नेगोशिएट कर रहे हैं? दाम होल्ड करो, छूट की जगह वैल्यू ऐड करो।
अंकिता को इंस्टाग्राम DMs पर रोज़ आता है: "₹350 चटनी के? बहुत ज़्यादा है।" वो दाम कम नहीं करतीं। रिप्लाई करती हैं: "100% ऑर्गेनिक इंग्रेडिएंट्स, अल्मोड़ा की विमेन सेल्फ़-मदद ग्रुप्स से सोर्स्ड, कोई प्रिज़र्वेटिव नहीं। शेल्फ़ लाइफ़ 6 मंथ्स ट्रेडिशनल रेसिपी से। एक बार ट्राई करके देखिए — मोस्ट ग्राहकों रीऑर्डर करते हैं।"
"सोचता हूँ / आई'ल थिंक अबाउट इट"
इसका मतलब या तो कन्विंस्ड नहीं हैं, या सच में बिज़ी हैं और भूल जाएँगे। दोनों केसेज़ में फ़ॉलो-अप करो।
- "बिल्कुल, सोचिए। कल एक मैसेज भेज दूँ रिमाइंड करने के लिए?"
- "कोई ख़ास डाउट है जो साफ़ कर सकता हूँ?"
"कॉम्पिटिटर सस्ता दे रहा है"
पैनिक मत करो। कॉम्पिटिटर की बुराई मत करो।
- एक्नॉलेज करो: "हाँ, मार्केट में और विकल्प हैं।"
- डिफ़रेंशिएट करो: "लेकिन मेरे पास सेम डे डिलीवरी है / आफ़्टर-सेल्स सपोर्ट है / गुणवत्ता गारंटी है।"
- चूज़ करने दो: "दोनों ट्राई करके देखिए।"
भंडारी अंकल जब कॉन्ट्रैक्टर बोलता है कि सामने वाली दुकान सस्ती है: "उनका रेट देख लिया? ठीक है। लेकिन जब डिलीवरी लेट होगी या मटीरियल में गुणवत्ता इश्यू आएगा तो कौन उठाएगा? मैं 22 साल से हूँ — मुझे एक बार कॉल करो, हो जाएगा।"
झूठ नहीं बोल रहे। डेस्परेट नहीं हैं। फ़ैक्ट्स बोल रहे हैं और ग्राहक को तय करने दे रहे हैं। ये आत्मविश्वास है — और ग्राहकों इसकी इज़्ज़त करते हैं।
B2B vs B2C सेलिंग
सब सेलिंग एक जैसी नहीं होती। किसे बेच रहे हो — इससे तरीक़ा बदलती है।
B2B — बिज़नेस टू बिज़नेस
भंडारी अंकल कॉन्ट्रैक्टर्स (बिज़नेसेज़) को बेचते हैं। रावत जी होलसेल मंडी ट्रेडर्स को बेचते हैं।
B2B की ख़ासियतें:
- कम ग्राहकों, बड़े ऑर्डर्स। भंडारी अंकल के 20-30 रेग्युलर कॉन्ट्रैक्टर्स हैं। हर एक साल में लाखों का सामान लेता है।
- रिश्ते बहुत मायने रखती हैं। ट्रस्ट सालों में बनता है। एक बुरा अनुभव — ग्राहक हमेशा के लिए चला गया।
- फ़ैसला लेने में टाइम लगता है। कॉन्ट्रैक्टर इम्पल्स में ₹5 लाख का मटीरियल नहीं ख़रीदता। तुलना करता है, नेगोशिएट करता है, क्रेडिट टर्म्स चेक करता है।
- क्रेडिट आम है। 15-45 दिन की पेमेंट टर्म्स स्टैंडर्ड हैं।
- टेक्निकल नॉलेज चाहिए। B2B ग्राहक उत्पाद जानता है। मार्केटिंग से नहीं बहकता। भंडारी अंकल को सीमेंट की ग्रेड्स और TMT बार्स का डिफ़रेंस पता होना चाहिए।
B2C — बिज़नेस टू कंज़्यूमर
पुष्पा दीदी वॉक-इन ग्राहकों को चाय बेचती हैं। नीमा और ज्योति टूरिस्ट्स को होमस्टे अनुभव बेचती हैं।
B2C की ख़ासियतें:
- बहुत ग्राहकों, छोटे ऑर्डर्स। पुष्पा दीदी रोज़ 80-100 लोगों को सर्व करती हैं। हर कोई ₹20-50 देता है।
- फ़र्स्ट इम्प्रेशन मायने रखता है। ग्राहक सेकंड्स में तय करता है — जगह साफ़ है? इंसान फ़्रेंडली है? उत्पाद अच्छा दिखता है?
- फ़ास्ट फ़ैसले। B2C परचेजेज़ मिनट्स में होती हैं, वीक्स में नहीं।
- कैश या डिजिटल पेमेंट अपफ़्रंट। क्रेडिट नहीं।
- इमोशन्स मायने रखते हैं। लोग चाय इसलिए पीते हैं क्योंकि गर्म लगती है, ख़ुशबू अच्छी है, और बनाने वाला अच्छा लगता है।
D2C — सीधा टू कंज़्यूमर (ऑनलाइन)
अंकिता सीधे कंज़्यूमर्स को इंस्टाग्राम और वेबसाइट से बेचती हैं — कोई मिडलमैन नहीं।
D2C की ख़ासियतें:
- स्टोरीटेलिंग सेल्स टूल है। अंकिता की ब्रांड स्टोरी — पहाड़ी इंग्रेडिएंट्स, विमेन आर्टिज़न्स, ट्रेडिशनल रेसिपीज़ — यही सेल्स पिच है।
- कंटेंट = सेल्स। हर इंस्टाग्राम स्टोरी, हर रील, हर ग्राहक समीक्षा रीपोस्ट — सब सेल्स एक्टिविटी है।
- ऑनलाइन ट्रस्ट बनने में टाइम लगता है। फ़ेस-टू-फ़ेस इंटरैक्शन नहीं है। समीक्षाज़, टेस्टिमोनियल्स, लगातार गुणवत्ता से ट्रस्ट बनता है।
- हायर मार्जिन्स, लेकिन ज़्यादा एफ़र्ट। मिडलमैन नहीं तो पर जार मुनाफ़ा ज़्यादा, लेकिन अंकिता सब ख़ुद सँभालती हैं — प्रोडक्शन, पैकेजिंग, शिपिंग, ग्राहक सेवा, मार्केटिंग।
ज़रूरी बात: पहले समझो कौन सा गेम खेल रहे हो। B2B में पेशेंस, रिश्ते, टेक्निकल नॉलेज चाहिए। B2C में स्पीड, वॉर्म्थ, फ़र्स्ट इम्प्रेशन चाहिए। D2C में कंटेंट, निरंतरता, ट्रस्ट-बिल्डिंग चाहिए। ग़लतियाँ तब होती हैं जब B2C टेक्नीक्स B2B में इस्तेमाल करो, या उल्टा।
क्रेडिट और पेमेंट टर्म्स
यहाँ सेल्स और कैश फ़्लो टकराते हैं — और यहीं बहुत से बिज़नेसेज़ मार खाते हैं।
भंडारी अंकल का क्रेडिट सिस्टम
भंडारी अंकल रेग्युलर कॉन्ट्रैक्टर्स को क्रेडिट देते हैं। ये विकल्पल नहीं है — हार्डवेयर बिज़नेस में क्रेडिट ही गेम है। क्रेडिट नहीं दोगे तो बड़े ऑर्डर्स नहीं मिलेंगे।
उनका सिस्टम:
- नया ग्राहक: कोई क्रेडिट नहीं। पेमेंट ऑन डिलीवरी या एडवांस। नो एक्सेप्शन्स.
- 2-3 सफल कैश ऑर्डर्स के बाद: 7 दिन क्रेडिट, छोटी अमाउंट (₹50,000 तक)।
- एस्टेबलिश्ड रिश्ता (1+ साल, रेग्युलर ऑर्डर्स): 15-30 दिन क्रेडिट, ₹2-3 लाख तक।
- ट्रस्टेड, लॉन्ग-टर्म कॉन्ट्रैक्टर्स (5+ साल): 30 दिन क्रेडिट, ₹5 लाख तक।
फ़िज़िकल रजिस्टर (बही खाता) रखते हैं, अब ऐप भी इस्तेमाल करते हैं आउटस्टैंडिंग क्रेडिट ट्रैक करने के लिए। हर शनिवार शाम समीक्षा करते हैं — किसका कितना बाक़ी है, रिमाइंडर भेजते हैं।
क्रेडिट कैसे मदद करता है — और कैसे नुक़सान
क्रेडिट से सेल्स बढ़ती हैं। कॉन्ट्रैक्टर उस शॉप से लेगा जो टर्म्स दे, उससे नहीं जो कैश माँग करे। क्रेडिट कॉम्पिटिटिव फ़ायदा है।
लेकिन क्रेडिट बिज़नेस बर्बाद भी कर सकता है। मैथ देखो:
भंडारी अंकल के पास किसी भी वक़्त ₹8 लाख आउटस्टैंडिंग क्रेडिट होता है। ₹8 लाख का माल जो डिस्ट्रीब्यूटर्स को पहले ही पे कर चुके हैं, लेकिन ग्राहकों से अभी कलेक्ट नहीं हुआ। अगर 10% बैड डेट हो गया — ग्राहकों ने पे ही नहीं किया — तो ₹80,000 गए। ये पूरे महीने का मुनाफ़ा हो सकता है।
क्रेडिट मैनेज करने के नियम:
- साफ़ लिमिट्स रखो। हर ग्राहक की क्रेडिट सीलिंग फ़िक्स। एक्सेप्शन्स नहीं — "अच्छे" ग्राहकों के लिए भी नहीं।
- साफ़ टाइमलाइन्स। 15 दिन मतलब 15 दिन। "अगले महीने कभी" नहीं।
- पेमेंट लेट हो तो नई आपूर्ति बंद। ये करना मुश्किल है, लेकिन ज़रूरी है। ₹2 लाख बाक़ी है और ₹3 लाख का नया ऑर्डर — "पहले पुराना साफ़ करो।"
- क्रेडिट लागत को मूल्य निर्धारण में इन्क्लूड करो। 30 दिन क्रेडिट मतलब 30 दिन पैसा लॉक्ड है। इसकी लागत है। दाम रिफ़्लेक्ट करे।
- ना बोलना सीखो। कुछ ग्राहकों क्रॉनिक लेट पेयर्स हैं। कुछ कभी पे नहीं करेंगे। जल्दी घाटे कट करो।
भंडारी अंकल ने 2019 में ₹1.5 लाख गँवाए जब एक कॉन्ट्रैक्टर प्रोजेक्ट बीच में छोड़कर ग़ायब हो गया। तब से एक नियम है: किसी भी ग्राहक का आउटस्टैंडिंग क्रेडिट ₹5 लाख से ज़्यादा नहीं होगा, ऑर्डर कितना भी बड़ा हो।
रिपीट ग्राहकों और रेफ़रल्स
नया ग्राहक लाना महँगा है। पुराने ग्राहक को रखना लगभग फ़्री है। सेल्स में ये सबसे ज़रूरी आइडिया है।
ग्राहक की लाइफ़टाइम वैल्यू
भंडारी अंकल और कॉन्ट्रैक्टर महेश जोशी का रिश्ता सोचो। महेश हर साल ₹8-10 लाख का मटीरियल ख़रीदते हैं। 6 साल से ग्राहक हैं। कुल परचेजेज़: ₹50-60 लाख। एक ग्राहक से।
अगर भंडारी अंकल ने पहली बार बदतमीज़ी कर दी होती, या डिलीवरी लेट करके सॉरी नहीं बोला होता — ₹50 लाख का रिश्ता ख़त्म।
ग्राहक की लाइफ़टाइम वैल्यू वो नहीं है जो आज ख़र्च करे। वो है जो सालों में ख़र्च करे — प्लस जितने लोगों को रेफ़र करे।
नीमा और ज्योति का रेफ़रल इंजन
नीमा और ज्योति बुकिंग्स ट्रैक करती हैं। डेटा:
- 60% बुकिंग्स रिपीट गेस्ट्स या पास्ट गेस्ट्स के रेफ़रल्स से आती हैं।
- रेफ़रल बुकिंग की लागत: लगभग ज़ीरो। ख़ुश गेस्ट अपने दोस्तों को बताता है।
- पेड ऐड्स से नई बुकिंग की लागत: ₹500-1,200 पर बुकिंग।
मैथ साफ़ है। एग्ज़िस्टिंग ग्राहकों ख़ुश रखना सस्ता है और ज़्यादा इफ़ेक्टिव है बजाय हमेशा नए ग्राहकों पीछे भागने के।
लॉयल्टी कैसे बनाएँ — बिना महँगे लॉयल्टी प्रोग्राम्स के
पॉइंट्स कार्ड या ऐप नहीं चाहिए। ये काम करता है:
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ग्राहकों को याद रखो। पुष्पा दीदी रेग्युलर्स का नाम, ड्रिंक प्रेफ़रेंस, शेड्यूल जानती हैं। लोग वैल्यूड फ़ील करते हैं।
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लगातारली डिलीवर करो। अंकिता के ग्राहकों जानते हैं हर जार सेम टेस्ट का होगा। भंडारी अंकल के कॉन्ट्रैक्टर्स जानते हैं सीमेंट टाइम पर आएगा। निरंतरता ट्रस्ट बनाती है।
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कम्प्लेंट्स अच्छे से सँभालो। ग़लतियाँ होंगी — कैसे रिस्पॉन्ड करते हो, वो ग़लती से ज़्यादा मायने रखता है। क्विक, ऑनेस्ट रेज़ोल्यूशन एंग्री ग्राहक को लॉयल बना देती है।
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सेल के बाद फ़ॉलो-अप करो। नीमा हर गेस्ट को चेकआउट के 2-3 हफ़्ते बाद व्हाट्सऐप मैसेज भेजती हैं। फ़्रेंडली मैसेज, हार्ड सेल नहीं। "Hope you enjoyed! अगर कोई जानने वाला ट्रिप प्लान कर रहा है, हमें ज़रूर बताइए!"
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एग्ज़िस्टिंग ग्राहकों को फ़र्स्ट एक्सेस दो। अंकिता जब नया उत्पाद लॉन्च करती हैं, पहले एग्ज़िस्टिंग ग्राहकों को बताती हैं, इंस्टाग्राम पोस्ट से पहले। स्पेशल फ़ील होता है।
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रेफ़रल्स सीधे माँगो। ज़्यादातर लोग ख़ुशी से रेफ़र करेंगे अगर अच्छा काम किया है। लेकिन ख़ुद से याद नहीं आएगा जब तक पूछो नहीं। "अगर कोई जानने वाला XYZ की तलाश में हो, तो मेरी तरफ़ भेज दीजिए" — आसान, इफ़ेक्टिव।
पुष्पा दीदी की स्टॉल को गूगल ऐड्स नहीं चाहिए। रेग्युलर्स दोस्तों को लाते हैं। दोस्त कलीग्स को लाते हैं। एक ख़ुश ग्राहक चेन शुरू कर देता है। ये सबसे सस्ता और रिलाएबल सेल्स चैनल है।
ऑनलाइन सेलिंग
इंटरनेट ने सिर्फ़ उत्पाद ढूँढने का तरीक़ा नहीं बदला — बेचने का तरीक़ा बदल दिया। अल्मोड़ा के पास गाँव की महिला अब Bangalore के ग्राहक को पहाड़ी मसाला बेच सकती है। मुनस्यारी का होमस्टे Mumbai से बुक हो सकता है।
अंकिता की इंस्टाग्राम सेलिंग जर्नी
अंकिता ने ज़ीरो पालनअर्स और ₹0 मार्केटिंग बजट से शुरू किया।
फ़ेज़ 1 — पहले कंटेंट, बाद में सेलिंग (मंथ 1-3)
सोर्सिंग ट्रिप्स की स्टोरीज़ — विलेजेज़ में महिलाओं से मिलना, रॉ इंग्रेडिएंट्स ख़रीदना, ट्रेडिशनल मेथड्स। किचन दिखाई, प्रक्रिया दिखाया, पैकेजिंग दिखाई। पहले महीने कुछ बेचने को नहीं बोला। ट्रस्ट और ऑडिएंस बना रही थीं।
फ़ेज़ 2 — DMs से सॉफ़्ट सेलिंग (मंथ 3-6)
स्टोरीज़ पर इंटरेस्ट दिखाने वालों को DM — दाम लिस्ट नहीं, कन्वर्सेशन। "कौन सी चटनी पसंद है? किस तरह के फ़्लेवर्स अच्छे लगते हैं? पहाड़ी खाना ट्राई किया है?" फिर ख़ास उत्पाद रेकमेंड करतीं।
फ़ेज़ 3 — रील्स, समीक्षाज़, और स्केलिंग (मंथ 6+)
ख़ुश ग्राहकों से फ़ोटोज़ और समीक्षाज़ माँगीं। रीपोस्ट किए। 30-सेकंड रील्स — उत्पाद अनबॉक्सिंग, खाने में इस्तेमाल, स्टोर-बॉट से कम्पेरिज़न। सोशल प्रूफ़ ने किसी ऐड से ज़्यादा सेल्स ड्राइव कीं।
टूलकिट:
- इंस्टाग्राम स्टोरीज़ और रील्स — डिस्कवरी के लिए
- DMs — सेल्स क्लोज़ करने के लिए
- गूगल फ़ॉर्म — ऑर्डर्स के लिए (फ़्री)
- गूगल पे / UPI — पेमेंट्स
- लोकल कूरियर — डिलीवरी
मार्केटप्लेसेज़: Amazon और Flipkart
अगर पैकेज्ड उत्पाद है, सही लेबलिंग है, FSSAI (फ़ूड के लिए) और GST रजिस्ट्रेशन है, तो मार्केटप्लेस पर लिस्ट कर सकते हैं।
फ़ायदे:
- ह्यूज रीच — लाखों ग्राहकों जो ख़ुद कभी नहीं मिलते
- बिल्ट-इन ट्रस्ट — ग्राहकों Amazon की डिलीवरी और रिटर्न्स पर भरोसा करते हैं
- ख़ुद की वेबसाइट बनाने की ज़रूरत नहीं
नुक़सानेज़:
- भारी कमीशन्स — 15-30% श्रेणी के हिसाब से
- ग्राहक रिश्ता आपकी नहीं, Amazon की
- दाम कॉम्पिटीशन फ़ियर्स — 20 सिमिलर उत्पाद के बगल में लिस्टेड हो
- रिटर्न्स और ग्राहक सेवा मार्जिन्स खा सकते हैं
अंकिता कुछ उत्पाद Amazon पर लिस्ट करती हैं, लेकिन बेस्टसेलर्स सिर्फ़ इंस्टाग्राम और वेबसाइट पर रखती हैं। लॉयल ग्राहकों सीधा ख़रीदें (हायर मार्जिन), Amazon न्यू ग्राहक डिस्कवरी के लिए।
व्हाट्सऐप बिज़नेस — लोकल बिज़नेसेज़ के लिए
लोकल बिज़नेसेज़ — शॉप्स, सेवाएँ, फ़ूड — के लिए व्हाट्सऐप बिज़नेस ताक़तवर और फ़्री सेल्स टूल है।
- उत्पाद कैटलॉग बनाओ — फ़ोटोज़ और दामेज़ के साथ उत्पाद लिस्ट करो। ग्राहकों व्हाट्सऐप में ही ब्राउज़ करें।
- क्विक रिप्लाइज़ सेट करो — आम क्वेश्चन्स के रेडी-मेड जवाब ("टाइमिंग क्या है?", "डिलीवरी करते हो?", "आज क्या अवेलेबल है?")
- ब्रॉडकास्ट मैसेजेज़ भेजो — न्यू अराइवल्स, स्पेशल पेशकश्स, सीज़नल उत्पाद। सबको एक साथ, बिना ग्रुप बनाए।
- लेबल्स — कन्वर्सेशन्स टैग करो "न्यू ऑर्डर," "पेमेंट पेंडिंग," "फ़ॉलो-अप" — ऑर्गेनाइज़्ड रहो।
पुष्पा दीदी ने 6 महीने पहले व्हाट्सऐप बिज़नेस शुरू किया। रेग्युलर ग्राहकों दफ़्तर मीटिंग्स के लिए चाय-नाश्ता प्री-ऑर्डर करते हैं। बिज़नेस कैटलॉग दिखाता है आज क्या अवेलेबल है। रोज़ सुबह ब्रॉडकास्ट: "आज के पकौड़े: आलू, पनीर, और ब्रेड पकोड़ा। फ़्रेश, 11 बजे तक।" आसान है, लेकिन हफ़्ते में ₹3,000-4,000 एक्स्ट्रा सेल्स आती हैं।
गूगल बिज़नेस प्रोफ़ाइल — मैप्स पर दिखो
जब कोई गूगल पर "chai near me" या "hardware shop Haldwani" सर्च करता है, तो मैप के साथ जो नतीजे आते हैं — वो गूगल बिज़नेस प्रोफ़ाइल्स हैं। फ़्री है। बहुत वैल्यूएबल है।
क्या चाहिए:
- गूगल अकाउंट
- बिज़नेस नेम, एड्रेस, फ़ोन नम्बर
- दुकान की कुछ फ़ोटोज़
- वर्किंग आवर्स
क्या होता है:
- बिज़नेस गूगल मैप्स पर दिखता है
- ग्राहकों सर्च नतीजे से सीधा कॉल कर सकते हैं
- आवर्स, फ़ोटोज़, समीक्षाज़ दिखते हैं
- ट्रस्ट बनता है — 50 समीक्षाज़, 4.5 स्टार्स वाली दुकान पर ज़्यादा लोग जाते हैं
पुष्पा दीदी की स्टॉल का अब गूगल बिज़नेस प्रोफ़ाइल है। टूरिस्ट्स "best chai in Rishikesh" सर्च करते हैं, उन्हें ढूँढ लेते हैं। 127 समीक्षाज़, 4.6 स्टार्स। इसके लिए एक पैसा नहीं दिया। बस रेग्युलर्स से समीक्षा माँगा।
नेगोशिएशन बुनियादी्स — सौदेबाज़ी कैसे करें
हर सेल में कुछ नेगोशिएशन होती है — दाम, टर्म्स, डिलीवरी, क्वांटिटी पर। बिना डील या इज़्ज़त खोए कैसे नेगोशिएट करें:
अपना वॉक-अवे दाम जानो
नेगोशिएशन से पहले दो नम्बर्स पता होने चाहिए:
- आइडियल दाम — जो तुम चाहते हो।
- वॉक-अवे दाम — मिनिमम जो स्वीकार करोगे। इससे नीचे डील करने लायक़ नहीं।
इन दो नम्बर्स के बीच नेगोशिएशन ज़ोन है।
रावत जी के सेब उगाने में ₹30/kg लगता है (लेबर, ट्रांसपोर्ट, ऑर्चर्ड बनाए रखेंस)। मंडी ट्रेडर से ₹55/kg चाहते हैं। वॉक-अवे दाम ₹42 है — इससे नीचे ट्रांसपोर्ट लागत निकालकर ब्रेक-ईवन भी मुश्किल।
ट्रेडर ₹38 बोलता है। रावत जी ना कहते हैं। ट्रेडर ₹44 पर आता है। रावत जी ₹50 काउंटर करते हैं। ₹47 पर सेटल होता है। दोनों ठीक।
अगर रावत जी को वॉक-अवे नम्बर नहीं पता होता, तो प्रेशर में ₹38 स्वीकार कर लेते — और नुक़सान होता।
विन-विन माइंडसेट
नेगोशिएशन लड़ाई नहीं है। बिज़नेस में वही लोगों से बार-बार नेगोशिएट करते हो। आज ज़्यादा स्क्वीज़ किया तो कल वापस नहीं आएँगे।
- नेगोशिएशन "जीतने" की कोशिश मत करो। ऐसा डील ढूँढो जो दोनों के लिए काम करे।
- ट्रेड करो, सिर्फ़ लो मत। ग्राहक कम दाम चाहता है? बदले में कुछ माँगो — ज़्यादा क्वांटिटी, एडवांस पेमेंट, लॉन्गर कॉन्ट्रैक्ट।
- फ़ेयर रहो। लागतें सच में बढ़ गए हैं और दाम रेज़ करना है? ऑनेस्टली समझाओ। ज़्यादातर वजहेबल लोग समझेंगे।
व्यावहारिक नेगोशिएशन टिप्स
- पहली पेशकश स्वीकार मत करो। इसलिए नहीं कि हमेशा काउंटर करना चाहिए, बल्कि पहली पेशकश फ़ाइनल नहीं होती।
- साइलेंस इस्तेमाल करो। अपनी पेशकश बोलने के बाद चुप रहो। सामने वाले को रिस्पॉन्ड करने दो। ज़्यादातर लोग साइलेंस से अनआरामदेह होते हैं और कन्सेशन्स दे देते हैं।
- अपने ख़िलाफ़ नेगोशिएट मत करो। ₹100 कोट किया, तो ₹90 ख़ुद मत बोलो जब तक ग्राहक ने काउंटर नहीं किया।
- लिखकर रखो। ख़ासकर बड़े डील्स में। हैंडशेक अच्छा है, लेकिन रिटन समझौता मिससमझिंग्स रोकती है।
- वॉक अवे करना सीखो। कुछ डील्स करने लायक़ नहीं होतीं। बुरी डील से हटना असफलता नहीं — अच्छी बिज़नेस सेंस है।
सेल्स ट्रैकिंग — गिनो कि क्या काम कर रहा है
जो मेज़र नहीं करोगे, सुधार नहीं कर सकते। ज़्यादातर स्मॉल बिज़नेसेज़ को पता ही नहीं कौन सा उत्पाद सबसे ज़्यादा बिकता है, कौन सा ग्राहक सबसे वैल्यूएबल है, कितने लोग आते हैं वर्सस कितने ख़रीदते हैं।
आसान डेली सेल्स लॉग
सॉफ़्टवेयर नहीं चाहिए। एक नोटबुक काफ़ी है। रोज़ ट्रैक करो:
| क्या बिका | Qty | दाम | ग्राहक टाइप | कैश/क्रेडिट |
|---|---|---|---|---|
| सीमेंट (ACC) | 50 बैग्स | ₹380/बैग | कॉन्ट्रैक्टर — जोशी | क्रेडिट 20 दिन |
| PVC पाइप 1" | 200 ft | ₹45/ft | वॉक-इन | कैश |
| वायरिंग (Havells) | 4 कॉइल्स | ₹1,800/कॉइल | इलेक्ट्रीशियन — किशन | कैश |
एक महीने बाद पैटर्न्स दिखेंगे। कौन सा उत्पाद बिक रहा है, कौन शेल्फ़ पर पड़ा है, कौन ग्राहक सबसे ज़्यादा ख़रीदता है, कैश ज़्यादा आ रहा है या क्रेडिट।
क्या बिक रहा है, क्या नहीं
वीकली समीक्षा करो:
- टॉप सेलर्स: 5 सबसे ज़्यादा बिकने वाले उत्पाद? इनका स्टॉक कभी ख़त्म नहीं होना चाहिए।
- डेड स्टॉक: 3+ महीने से दुकान में पड़ा है? छूट करो, आपूर्तिकर्ता को वापस करो, या पॉपुलर आइटम के साथ बंडल करो।
- सीज़नल पैटर्न्स: सेल्स कब पीक करती हैं? कब डिप? पीक के लिए तैयारी करो, डिप बचो।
भंडारी अंकल ने लॉग से गौर किया कि इलेक्ट्रिकल वायरिंग अक्टूबर-नवम्बर में स्पाइक करती है (फ़ेस्टिव सीज़न, सर्दियों से पहले न्यू कंस्ट्रक्शन्स)। अब सितम्बर में एक्स्ट्रा वायरिंग प्री-स्टॉक करते हैं और बल्क ऑर्डर पर डिस्ट्रीब्यूटर से बेहतर रेट मिलता है।
कन्वर्ज़न रेट — सिम्प्लिफ़ाइड
ऑनलाइन वर्ल्ड का कॉन्सेप्ट, लेकिन हर जगह एप्लिकेबल:
कन्वर्ज़न रेट = ख़रीदने वाले ÷ आने वाले (या पेज विज़िटर्स)
अगर 100 लोग पुष्पा दीदी की स्टॉल के सामने से गुज़रें और 30 रुकें, कन्वर्ज़न रेट 30%। छोटा बोर्ड लगाया "फ़्रेश पकौड़े — ₹20 प्लेट" — अब 40 रुकते हैं, रेट 40%।
अंकिता की रील 10,000 व्इस्तेमाल मिलें और 50 DMs आएँ, कन्वर्ज़न 0.5%। कैप्शन में साफ़ दाम और "DM to order" लगाया — 80 DMs, कन्वर्ज़न 0.8%।
प्रीसाइज़ली गणना करने की ज़रूरत नहीं। बस पूछो: "मेरा बिज़नेस जितने लोग देखते हैं, उनमें से कितने ख़रीदते हैं?" नम्बर कम है तो सेल्स प्रक्रिया में कुछ ठीक करना है — डिस्प्ले, पिच, मूल्य निर्धारण, या फ़ॉलो-अप।
आम सेल्स ग़लतियाँ — आम ग़लतियाँ
22 साल में भंडारी अंकल ने हर ग़लती देखी है। सबसे ज़्यादा नुक़सान पहुँचाने वाली:
1. ख़ुद को सस्ते में बेचना
अंकिता ने शुरू में पहाड़ी चटनी ₹150/जार रखी। डर था ज़्यादा दाम पर कोई नहीं ख़रीदेगा। लेकिन लागत पर जार ₹95 था (इंग्रेडिएंट्स, लेबर, पैकेजिंग, शिपिंग)। मुनाफ़ा सिर्फ़ ₹55 — मार्केटप्लेस फ़ीस या इंस्टाग्राम ऐड्स निकालो तो कुछ नहीं बचता।
एक मेंटर ने बताया: "उत्पाद प्रीमियम है। इंग्रेडिएंट्स ऑर्गेनिक हैं। स्टोरी रियल है। ₹350 दाम रखो और सही ग्राहकों ढूँढो।"
दाम ₹350 किया। कुछ दाम-सेंसिटिव ग्राहकों गए। लेकिन जो रुके वो ज़्यादा ख़रीदें, फिर ख़रीदें, दोस्तों को बताएँ। राजस्व असलीी बढ़ा — कम ग्राहकों के साथ।
असली लागत फ़ायदा नहीं है तो दाम पर मुक़ाबला मत करो। गुणवत्ता, ट्रस्ट, और सेवा पर मुक़ाबला करो।
2. ज़बरदस्ती करना
किसी को प्रेशर में रखना पसंद नहीं। "सोचता हूँ" बोला तो सोचने दो। एक-दो दिन बाद पोलाइटली फ़ॉलो-अप करो। एक दिन में पाँच बार कॉल मत करो।
ग्राहक को ट्रैप्ड फ़ील करवाना — ये सबसे तेज़ तरीक़ा है ग्राहक खोने का।
3. फ़ॉलो-अप नहीं करना
ज़बरदस्ती का दूसरा एक्सट्रीम — ग़ायब हो जाना। ग्राहक इंटरेस्ट दिखाता है, ब्योरा माँगता है। "भेजता हूँ" बोलते हो। फिर भूल जाते हो। तीन दिन बाद वो किसी और से ख़रीद चुका है।
फ़ॉलो-अप करना पुशी नहीं है। पेशेवर है।
आसान नियम: इंटरेस्ट दिखाया तो 24 घंटे में फ़ॉलो-अप। कुछ भेजने बोला तो तुरंत भेजो। "अगले हफ़्ते बताता हूँ" बोला तो रिमाइंडर लगाओ और अगले हफ़्ते चेक करो।
4. बहुत ज़्यादा छूट देकर डील क्लोज़ करना
भंडारी अंकल के पास दो साल पहले एक नई हार्डवेयर शॉप खुली। ओनर को ग्राहकों चाहिए थे। सब चीज़ पर 5-8% छूट शुरू किया। ग्राहकों भर गए। बहुत सेल हो रही थी।
लेकिन मार्जिन्स पहले ही पतले थे। छह महीने बाद पता चला कई आइटम्स पर घाटा हो रहा है। डिस्ट्रीब्यूटर बेहतर रेट नहीं देता क्योंकि वॉल्यूम अभी काफ़ी नहीं। 14 महीने में बंद।
छूट से राजस्व बढ़ता दिखता है। लेकिन मुनाफ़ा ज़ीरो हो गया तो सोशल सेवा हो रही है, बिज़नेस नहीं।
कब छूट दो:
- डेड स्टॉक हटाना हो
- बल्क ऑर्डर जहाँ वॉल्यूम सच में लागत कम करे
- स्ट्रेटजिक फ़र्स्ट परचेज़ — हाई-वैल्यू लॉन्ग-टर्म ग्राहक एक्वायर करने के लिए
कब छूट मत दो:
- हर कॉम्पिटिटर का दाम मैच करने के लिए
- ग्राहक ने "प्लीज़" बोल दिया इसलिए
- सेल खोने के डर से
- बेस्ट-सेलिंग उत्पाद पर (वो बिना छूट के भी बिकते हैं)
5. सबको बेचने की कोशिश
सब आपके ग्राहक नहीं हैं। और ये ठीक है।
अंकिता ने एक कॉर्पोरेट बायर को दो हफ़्ते कन्विंस करने में लगाए — दिवाली गिफ़्टिंग के लिए 500 जार्स ₹180/जार पर। लागत ₹95। स्पेशल पैकेजिंग ₹40, कूरियर ₹30, कस्टमाइज़ेशन एफ़र्ट — मुनाफ़ा ₹15/जार। कुल ₹7,500 — दो हफ़्ते की मेहनत और ₹47,500 भंडार जोखिम के लिए।
उन्होंने ना बोला। वही दो हफ़्ते D2C दिवाली कैम्पेन में लगाए — 200 गिफ़्ट बॉक्सेज़ ₹900 ईच। 140 बिके। राजस्व: ₹1,26,000। मुनाफ़ा: ₹42,000।
जानो कि बेस्ट ग्राहकों कौन हैं और ऊर्जा वहाँ लगाओ।
क्विक-रेफ़रेंस चेकलिस्ट
चैप्टर ख़त्म करने से पहले, एक चेकलिस्ट — बाद में रेफ़र करने के लिए:
- मुझे पता है मेरे ग्राहकों कौन हैं और उन्हें क्या चाहिए
- मैं पहले सुनता/सुनती हूँ, बाद में पिच करता/करती हूँ
- मुझे हर नेगोशिएशन में अपना वॉक-अवे दाम पता है
- मेरे पास ऑब्जेक्शन्स सँभालने का सिस्टम है
- मुझे पता है मैं B2B, B2C, या D2C कर रहा/रही हूँ — तरीक़ा एकॉर्डिंगली एडजस्ट करता/करती हूँ
- साफ़ क्रेडिट टर्म्स हैं और एनफ़ोर्स करता/करती हूँ
- इंटरेस्टेड ग्राहकों को 24 घंटे में फ़ॉलो-अप करता/करती हूँ
- ख़ुश ग्राहकों से रेफ़रल्स माँगता/माँगती हूँ
- कम से कम एक ऑनलाइन टूल इस्तेमाल करता/करती हूँ (व्हाट्सऐप बिज़नेस, गूगल प्रोफ़ाइल, इंस्टाग्राम, मार्केटप्लेस)
- वीकली ट्रैक करता/करती हूँ — क्या बिक रहा है, क्या नहीं
- छूट डर से नहीं, रणनीति से देता/देती हूँ
आगे क्या आ रहा है
अब बेचना आ गया। लेकिन ग्राहक डोर पर आए या ऑनलाइन ढूँढे — इससे पहले उसे पता तो चले कि आप एग्ज़िस्ट करते हो। उसने आपके बारे में सुना हो, उत्पाद देखा हो, या किसी ट्रस्टेड इंसान से रेकमेंड हुआ हो। ये है मार्केटिंग।
मार्केटिंग लोगों को दरवाज़े तक लाती है। सेल्स उन्हें अंदर लाती है। रिलेटेड हैं, लेकिन अलग हैं। अगले चैप्टर में सीखेंगे कि कैसे दिखो — ऐसे बजट में जो पुष्पा दीदी और अंकिता दोनों अफ़ोर्ड कर सकें।
अगले चैप्टर में अंकिता इंस्टाग्राम एनालिटिक्स देख रही हैं। लास्ट रील को 47,000 व्इस्तेमाल मिले लेकिन सिर्फ़ 12 ऑर्डर्स। पुष्पा दीदी की ऑनलाइन प्रेज़ेंस ज़ीरो है लेकिन स्टॉल के बाहर रोज़ सुबह लाइन लगती है। मार्केटिंग के बारे में पुष्पा दीदी को क्या पता है जो अंकिता अभी सीख रही हैं?