Exit — बाहर निकलना
वो पेशकश
PahadiDirect लॉन्च हुए चार साल हो गए। प्रिया को एक ईमेल आई जिसने सब बदल दिया।
AgriConnect से — India के सबसे बड़े एग्री-टेक प्लेटफ़ॉर्म्स में से एक, ₹800 करोड़ VC फ़ंडिंग, 12 स्टेट्स में ऑपरेट। सब्जेक्ट लाइन ब्लैंड थी: "साझेदारी डिस्कशन।" लेकिन ईमेल कुछ और ही था।
मिलना चाहते थे। इन पर्सन। Delhi में।
दो हफ़्ते बाद, प्रिया AgriConnect के चमकते Gurgaon दफ़्तर में बैठी थी — 30,000 स्क्वेयर फ़ीट, 400 एम्प्लॉइज़, बरिस्ता वाली कैफ़ेटेरिया। हल्द्वानी दफ़्तर से कॉन्ट्रास्ट (मिठाई की दुकान के ऊपर दो कमरे, 8 एम्प्लॉइज़, पुष्पा दीदी से चाय) — बहुत स्टार्क था।
CEO सीधा था। "हम PahadiDirect एक्वायर करना चाहते हैं। हिल्स में आपका फ़ार्मर नेटवर्क — वो हम ख़ुद नहीं बना सकते। ट्राई किया। दो बार टीम्स Uttarakhand भेजीं। फ़ार्मर्स का ट्रस्ट नहीं मिला। आपका प्लेटफ़ॉर्म वो करता है जो हम नहीं कर पाए।"
पॉज़। "₹12 करोड़ पेशकश करने को तैयार हैं।"
प्रिया की धड़कन बढ़ गई। ₹12 करोड़। ₹8 लाख सेविंग्स से शुरू किए थे। चाय शॉप से ऐप बनाया।
टाइम माँगा सोचने का। निवेशक को कॉल किया। मेंटर को। पेरेंट्स को।
तीन रात सोई नहीं।
एग्ज़िट क्या है?
स्टार्टअप लैंग्वेज में "एग्ज़िट" भागना नहीं है। ये वो मोमेंट है जब फ़ाउंडर्स और अर्ली निवेशक अपनी बनाई वैल्यू रियलाइज़ करते हैं — ओनरशिप (इक्विटी) को असली मनी में कन्वर्ट करते हैं।
ऐसे सोचो: जब तुम्हारे पास ₹20 करोड़ वैल्यूएशन की कंपनी का 60% है, तो पेपर पर ₹12 करोड़ "वर्थ" हो। लेकिन पेपर वैल्यूएशन से ग्रोसरी नहीं ख़रीद सकते। एग्ज़िट वो है जब पेपर कैश बनता है।
हर बिज़नेस को "एग्ज़िट" नहीं चाहिए। पुष्पा दीदी की चाय शॉप को एग्ज़िट स्ट्रैटेजी नहीं चाहिए। वो चलाती हैं, पैसे बनती हैं, जब तक चाहें चलाएँगी। वैलिड है।
लेकिन वेंचर-फ़ंडेड स्टार्टअप्स जहाँ निवेशक ने रिटर्न्स उम्मीद रखके पैसे डाले — इवेंचुअली एग्ज़िट अपेक्षित है। सिस्टम ऐसे काम करता है — VCs निवेश करते हैं, स्टार्टअप्स ग्रो करती हैं, एग्ज़िट्स होते हैं, निवेशक रिटर्न्स पाते हैं, साइकल कंटिन्यू होता है।
एग्ज़िट्स के टाइप्स
एक्विज़िशन (सबसे आम)
बड़ी कंपनी आपकी कंपनी ख़रीदती है। AgriConnect यही प्रपोज़ कर रहा है प्रिया को।
क्यों एक्वायर करते हैं:
- टेक्नोलॉजी चाहिए
- ग्राहकों/इस्तेमालर्स चाहिए
- टीम चाहिए ("एक्वी-हायर")
- मुक़ाबलाीटर एलिमिनेट करना
- नया मार्केट एंटर करना (AgriConnect को हिल फ़ार्मर नेटवर्क चाहिए)
IPO (Initial Public Offering)
कंपनी शेयर्स स्टॉक एक्सबदलाव (BSE, NSE) पर लिस्ट होते हैं। पब्लिक ख़रीद-बेच सकती है। फ़ाउंडर्स और निवेशक मार्केट में शेयर्स बेच सकते हैं।
कब सेंस बनता है:
- कंपनी बड़ी है (₹500+ करोड़ राजस्व)
- फ़ायदेमंद है या साफ़ पाथ है
- पब्लिक कैपिटल एक्सेस चाहिए
"बिग" एग्ज़िट। Zomato, Nykaa, Freshworks सोचो। ज़्यादातर स्टार्टअप्स यहाँ नहीं पहुँचतीं।
सेकेंडरी सेल
फ़ाउंडर्स या अर्ली निवेशक अपने शेयर्स लेटर-चरण निवेशक को बेचते हैं — एक्विज़िशन या IPO नहीं, प्राइवेट ट्रांज़ैक्शन।
इंक्रीज़िंगली आम। फ़ाउंडर्स कुछ पैसे "टेबल से उठा" सकते हैं बिना पूरी कंपनी बेचे।
प्रबंधन बायआउट (MBO)
प्रबंधन टीम कंपनी निवेशक से ख़रीदती है। इंडियन स्टार्टअप्स में रेयर, लेकिन होता है।
एग्ज़िट कब कंसीडर करें
फ़ाइनेंशियल वजहें:
- पेशकश इतना अच्छा है कि फ़ाइनेंशियल फ़्यूचर सिक्योर हो
- कंपनी की बढ़त प्लेटो कर रही है, बड़ा प्लेटफ़ॉर्म आगे ले जा सकता है
- निवेशक को लिक्विडिटी चाहिए (VC फ़ंड्स 7-10 साल लाइफ़, LPs को पैसे लौटाने हैं)
स्ट्रैटेजिक वजहें:
- बड़ी कंपनी उत्पाद के साथ ज़्यादा कर सकती है
- मार्केट कंसॉलिडेट हो रहा है, इंनिर्भर रहना मुश्किल
- ₹100+ करोड़ चाहिए सीलिंग तोड़ने को, रेज़ नहीं कर सकते
पर्सनल वजहें:
- बर्नड आउट हो, कंपनी को वो नहीं दे पा रहे जो चाहिए
- कुछ नया शुरू करना है
- लाइफ़ प्रायोरिटीज़ बदल गई हैं
कब एग्ज़िट मत करो:
- सिर्फ़ इसलिए कि पेशकश आया — फ़्लैटरी वजह नहीं है
- रैपिड बढ़त में हो — चीप बेच रहे हो
- ऑल्टरनेटिव्स एक्सप्लोर नहीं किए — एक पेशकश मार्केट नहीं है
- डर से — "बाद में नाकाम हो गई तो?" अच्छा वजह नहीं
एक्विज़िशन्स कैसे काम करती हैं
चरण 1: लेटर ऑफ़ इंटेंट (LOI)
एक्वायरिंग कंपनी नॉन-बाइंडिंग LOI भेजती है — प्रपोज़्ड दाम, स्ट्रक्चर, टाइमलाइन, एक्सक्लूसिविटी पीरियड।
चरण 2: ड्यू डिलिजेंस (4-8 हफ़्ते)
एक्वायरर की टीम सब एग्ज़ामिन करती है:
- फ़ाइनेंशियल: राजस्व, ख़र्चे, कॉन्ट्रैक्ट्स, डेट्स, कैप टेबल
- लीगल: IP ओनरशिप, घाटाूट्स, रेगुलेटरी कम्प्लायंस
- टेक्निकल: कोड गुणवत्ता, आर्किटेक्चर, सिक्योरिटी
- HR: एम्प्लॉई कॉन्ट्रैक्ट्स, की पर्सन निर्भरेंसीज़
- कमर्शियल: ग्राहक कॉन्ट्रैक्ट्स, रिटेंशन रेट्स
सबसे स्ट्रेसफ़ुल पार्ट। भूली हुई चीज़ें निकलेंगी — टर्मिनेट नहीं किया पुराना कॉन्ट्रैक्ट, लेट टैक्स फ़ाइलिंग, IP असाइनमेंट बिना फ़्रीलांसर का कोड।
टिप: डे 1 से हाउस इन ऑर्डर रखो। क्लीन कैप टेबल, सही कॉन्ट्रैक्ट्स, व्यवस्थित्ड फ़ाइनेंसेज़।
चरण 3: नेगोशिएशन
ड्यू डिलिजेंस के बेसिस पर पेशकश रिवाइज़ हो सकता है। नेगोशिएट:
- फ़ाइनल दाम
- पेमेंट स्ट्रक्चर (ऑल कैश? पार्ट स्टॉक? अर्नआउट?)
- एम्प्लॉई रिटेंशन टर्म्स
- फ़ाउंडर लॉक-इन पीरियड
- नॉन-मुक़ाबला क्लॉज़ेज़
चरण 4: डेफ़िनिटिव समझौता
दोनों तरफ़ लॉयर्स फ़ाइनल समझौता ड्राफ़्ट करते हैं। बाइंडिंग लीगल डॉक्यूमेंट।
चरण 5: क्लोज़िंग
डॉक्यूमेंट्स साइन। मनी ट्रांसफ़र। कंपनी ऑफ़िशियली हैंड्स बदलाव।
कुल: 3-6 मंथ्स LOI से क्लोज़ तक।
सबको क्या होता है
फ़ाउंडर्स
डील पर निर्भर करता है:
- फ़ुल एग्ज़िट: सारे शेयर्स बेचो, पेड हो जाओ, निकलो (ट्रांज़िशन पीरियड के बाद)
- पार्शियल एग्ज़िट: कुछ शेयर्स बेचो, एक्वायरिंग व्यवस्थितेशन में कंपनी चलाते रहो
- लॉक-इन पीरियड: ज़्यादातर एक्विज़िशन्स में फ़ाउंडर्स को 1-3 साल रुकना पड़ता है
- अर्नआउट: पेआउट का हिस्सा फ़्यूचर माइलस्टोन्स हिट करने पर निर्भर — जोखिमी
निवेशक
निवेश समझौता के टर्म्स के हिसाब से पेड:
- लिक्विडेशन प्रेफ़रेंस पहले — निवेशक को पहले पैसे
- रिमेनिंग अमाउंट ओनरशिप पर्सेंटेजेज़ से स्प्लिट
- दाम ज़्यादा हो तो सब विन। कम हो तो निवेशक पेड, फ़ाउंडर्स को कम मिले (लिक्विडेशन प्रेफ़रेंस)
एम्प्लॉइज़
फ़ाउंडर्स सबसे ज़्यादा यहीं वरी करते हैं:
- कुछ एम्प्लॉइज़ को एक्वायरिंग कंपनी जॉब पेशकश करेगी
- कुछ लेड ऑफ़ हो सकते हैं (रोल ओवरलैप)
- ESOPs कैश आउट या कन्वर्ट
- कल्चर बदलेगी — छोटा स्टार्टअप जॉइन किया था, अब कॉर्पोरेशन
"सबसे बड़ी चिंता पैसों की नहीं थी," प्रिया ने बाद में बताया। "दीपक की थी, ऑप्स प्रबंधक। और सुनीता की, फ़ील्ड एजेंट अल्मोड़ा में। उन्होंने PahadiDirect पर बिलीव किया। AgriConnect उन्हें हटाकर Gurgaon से लोग लाए — तो मैं नाकाम कर गई उनके साथ।"
ज़्यादातर स्टार्टअप्स का ग्लैमरस एग्ज़िट नहीं होता
नंबर्स ऑनेस्ट रहें।
सीड फ़ंडिंग पाने वाली स्टार्टअप्स में से:
- लगभग 90% नाकाम या स्टैग्नेट करती हैं
- 7-8% एक्वायर्ड होती हैं (अक्सर मॉडेस्ट वैल्यूएशन पर)
- 1-2% बड़ी कंपनीज़ बनती हैं
- 0.5% से कम IPO तक पहुँचती हैं
मीडिया IPOs और बिलियन-डॉलर एक्विज़िशन्स कवर करती है। हज़ारों स्टार्टअप्स जो क्वाइटली बंद हुईं, एक्वी-हायर हुईं, मर्ज हुईं — उन्हें कवर नहीं करती।
और ठीक है।
5 साल चली, 20 लोगों को एम्प्लॉय किया, हज़ारों ग्राहकों सर्व किए, फिर बंद — असफलता नहीं है। जॉब्स क्रिएट किए, समस्याएँ हल की, अनुभव दिया जो किसी MBA से ज़्यादा वैल्यूएबल है।
फ़ायदेमंद बिज़नेस चलाना ख़ुद एग्ज़िट स्ट्रैटेजी है
वो विकल्प जिसके बारे में स्टार्टअप इवेंट्स में कोई नहीं बोलता:
एग्ज़िट मत करो। फ़ायदेमंद कंपनी बनाओ और चलाओ।
PahadiDirect ₹2 करोड़ एनुअल मुनाफ़ा जेनरेट करे और प्रिया का 50% हो — ₹1 करोड़ पर ईयर। कंपनी बेचनी नहीं। IPO नहीं चाहिए। आमदनी है, असर है, ऑटोनॉमी है।
VC सर्कल्स में इसे "लाइफ़स्टाइल बिज़नेस" बोलते हैं, डिसमिसिवली। लेकिन सोचो:
- ₹1 करोड़ पर ईयर पर्सनल आमदनी
- वो काम जो पसंद है
- जहाँ रहना है वहाँ रहना (हल्द्वानी, Gurgaon नहीं)
- अपना शेड्यूल
- बोर्ड मीटिंग्स नहीं, निवेशक प्रेशर नहीं
बहुत फ़ाउंडर्स के लिए ₹12 करोड़ एक्विज़िशन से बेहतर आउटकम — जहाँ किसी और के नीचे 3 साल काम करना पड़े।
कैच: ये विकल्प बड़ी VC फ़ंडिंग ली हो तो काम नहीं करता। VCs को एग्ज़िट्स चाहिए फ़ंड रिटर्न करने। "फ़ायदेमंद बिज़नेस चलाऊँगी" — उन्होंने इसके लिए साइन अप नहीं किया।
इसीलिए VC मनी लेने का फ़ैसला इतना ज़रूरी है।
भंडारी अंकल 25 साल से हार्डवेयर शॉप चला रहे हैं। ₹8-10 लाख नेट मुनाफ़ा पर ईयर। नो निवेशक, नो बोर्ड, नो एग्ज़िट स्ट्रैटेजी। रिटायर होंगे तो बेटे को दे देंगे। TechCrunch आर्टिकल नहीं लिखेगा कोई। लेकिन ज़्यादातर स्टार्टअप फ़ाउंडर्स से ज़्यादा लास्टिंग वेल्थ बनाई है।
प्रिया का फ़ैसला
प्रिया ने दो हफ़्ते सोचा।
₹12 करोड़ बहुत लग रहा था। लेकिन निवेशक पेआउट्स (एंजेल्स और सीड फ़ंड — 22% ओनरशिप) के बाद उसका शेयर ₹9.4 करोड़। टैक्स के बाद ₹7 करोड़ के क़रीब।
₹7 करोड़ लाइफ़-बदलाविंग मनी है। पेरेंट्स के लिए घर, फ़्यूचर सिक्योर, कुछ नया शुरू करो।
लेकिन क्या खोएगी सोचा। फ़ार्मर्स जिन्होंने ट्रस्ट किया। टीम जो बनाई। विज़न — प्लेटफ़ॉर्म जो हिल एग्रीकल्चर ट्रांसफ़ॉर्म करे पूरे India में। अभी डन नहीं है।
AgriConnect के पास काउंटर-प्रपोज़ल लेकर गई।
"PahadiDirect बेचना नहीं चाहती। लेकिन साझेदार करूँगी। नेक्स्ट राउंड में निवेश करो। लॉजिस्टिक्स नेटवर्क इंटीग्रेट करो। हमारे फ़ार्मर्स को आपका बायर बेस, आपको हमारा हिल रीजन नेटवर्क। दोनों जीतें।"
AgriConnect CEO ने एक हफ़्ता सोचा। फिर अग्री किया।
PahadiDirect ने सीरीज़ A रेज़ किया — ₹8 करोड़ — AgriConnect लीड निवेशक और स्ट्रैटेजिक साझेदार।
प्रिया ने कंपनी रखी, टीम रखी, मिशन रखा। और कुछ मिला जो पहले नहीं था: नेशनल-स्केल इंफ़्रास्ट्रक्चर।
"एग्ज़िट करूँगी कभी," उसने मेंटर से बोला। "लेकिन आज नहीं। आज बस शुरुआत है।"
की टेकअवेज़
- एग्ज़िट इक्विटी को कैश बनाता है। वेंचर-फ़ंडेड स्टार्टअप्स का एंडगेम।
- एक्विज़िशन्स सबसे आम एग्ज़िट। IPOs रेयर हैं। यथार्थवादी आउटकम्स प्लान करो।
- प्रक्रिया 3-6 मंथ्स — LOI, ड्यू डिलिजेंस, नेगोशिएशन, लीगल।
- टीम का सोचो। एग्ज़िट सबको असर डालता है, सिर्फ़ फ़ाउंडर्स-निवेशक को नहीं।
- ज़्यादातर स्टार्टअप्स का ग्लैमरस एग्ज़िट नहीं होता। सामान्य है।
- फ़ायदेमंद बिज़नेस वैलिड एग्ज़िट स्ट्रैटेजी है — जब तक बड़ी VC फ़ंडिंग नहीं ली।
- सिर्फ़ पेशकश आया इसलिए मत बेचो। ऑल्टरनेटिव्स और पर्सनल गोल्स समझो।
- फ़ैसला पर्सनल है। फ़ॉर्मूला नहीं। फ़ाइनेंसेज़, ऊर्जा, विज़न, लाइफ़ पर निर्भर करता है।
प्रिया की स्टोरी कंटिन्यू करती है। लेकिन स्टार्टअप चैप्टर्स पीछे छूट गए। फ़ाइनल चैप्टर में ज़ूम आउट करते हैं। सात कैरेक्टर्स — तीन साल बाद कहाँ हैं? क्या सीखा? कौन सी माइंडसेट अलग करती है जो टिके उन्हें जो नहीं टिके? साथ में ये जर्नी क्लोज़ करते हैं।